Indian Politics News:– PM Modi की छवि कैसे बनी और अब क्यों तेज़ी से धूमिल हो रही है

Indian Politics News: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक छवि केवल चुनावी जीत या प्रशासनिक फैसलों तक सीमित नहीं रही। यह एक सुनियोजित ब्रांडिंग, मीडिया नैरेटिव और ध्रुवीकरण की लंबी प्रक्रिया का परिणाम रही है। लेकिन बदलते सामाजिक–आर्थिक हालात में यही छवि अब तेजी से चुनौती झेल रही है।
Raipur | रायपुर।
भारतीय राजनीति में PM Modi का उभार एक संगठित छवि निर्माण की मिसाल माना जाता है। गुजरात के मुख्यमंत्री काल में उन्हें एक ओर “मजबूत प्रशासक” के रूप में प्रस्तुत किया गया, वहीं 2002 के दंगों ने उनकी छवि को गहरे विवादों से भी जोड़ा। यही दो ध्रुव—प्रशासनिक क्षमता और नैतिक सवाल—आगे चलकर उनकी राष्ट्रीय राजनीति की धुरी बने।

लोकतंत्र में जब नीतियों से अधिक व्यक्तित्व केंद्र में आ जाए, तब राजनीति ब्रांड आधारित हो जाती है। PM Modi इसी ब्रांड राजनीति के केंद्र में रहे, जहां करिश्मा, नारे और भावनात्मक अपील को नीतिगत बहस से ऊपर रखा गया। उन्हें “निर्णायक”, “मजबूत” और “राष्ट्र के रक्षक” के रूप में स्थापित किया गया।
2002 के बाद अंतरराष्ट्रीय आलोचना को जहां एक वर्ग ने नकारात्मक माना, वहीं समर्थकों ने इसे उनकी दृढ़ता का प्रमाण बताकर प्रचारित किया। राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए बाद में ‘विकास पुरुष’ का नया नैरेटिव सामने लाया गया। ‘वाइब्रेंट गुजरात’ जैसे आयोजनों और कॉर्पोरेट समर्थन ने इस छवि को और मजबूत किया।
2014 से पहले देश में यह धारणा बनाई गई कि भारत नीतिगत जड़ता से गुजर रहा है और PM Modi ही इसका समाधान हैं। नोटबंदी जैसे फैसलों को, उनके व्यापक सामाजिक–आर्थिक नुकसान के बावजूद, राष्ट्रहित और बलिदान की भाषा में प्रस्तुत किया गया। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों और काले धन के मुद्दों ने भी सत्ता परिवर्तन के माहौल को मजबूत किया।
सत्ता में आने के बाद मीडिया स्वामित्व में बदलाव और संस्थानों पर बढ़ते दबाव के आरोप सामने आए। आलोचना को देशविरोधी करार देने और समर्थन को राष्ट्रभक्ति से जोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ी। इससे व्यक्तित्व–पूजा मजबूत हुई और लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर पड़ा।
वे कारण जिनसे PM Modi की छवि पर असर पड़ रहा है
विश्लेषकों के मुताबिक, अर्थव्यवस्था को नारों के भरोसे छोड़ना, बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याएं और युवाओं में बढ़ती असंतुष्टि बड़ी चुनौती बन चुकी है। नोटबंदी और अव्यवस्थित GST से असंगठित क्षेत्र को गहरा झटका लगा।
पूरी सत्ता को एक चेहरे पर केंद्रित करने से संस्थागत नेतृत्व कमजोर हुआ और हर संकट सीधे प्रधानमंत्री की साख से जुड़ गया। लगातार ध्रुवीकरण की राजनीति से सामाजिक तनाव बढ़ा, जबकि आम नागरिक के रोजमर्रा के सवाल अनुत्तरित रहे।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि PM Modi की सत्ता किसी एक घटना से नहीं, बल्कि इन तमाम कारकों के संयुक्त दबाव से प्रभावित हो रही है। इतिहास बताता है—जब सवाल प्रचार से बड़े हो जाते हैं और ज़मीनी हकीकत नारों पर भारी पड़ने लगती है, तब सबसे मजबूत दिखने वाली छवि भी दरकने लगती है।

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