अफ़सर का सफ़र,Nyaydhani की नज़र, कलम की ताक़त,कुर्सी की डगर…इस बार पढ़िए IPS Shashimohan Singh की सफ़र

जहां कानून डर नहीं, भरोसा बन गया – IPS शशिमोहन सिंह का जशपुर मॉडल जिसने बदल दी पुलिसिंग की परिभाषा
IPS Shashimohan Singh Biography: – कानून के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उतनी ही अटल है, जितनी लोहे की धार पर चलती सर्जिकल सटीकता। लेकिन यही सख्ती, जब आम नागरिकों के सामने आती है, तो एक अलग ही रूप ले लेती है। IPS शशिमोहन सिंह की वर्दी में सिर्फ कड़ापन नहीं, बल्कि संवेदनशीलता भी झलकती है।
अपराधियों और संगठित गिरोहों के लिए वे एक कठोर दीवार की तरह हैं, जिनकी उपस्थिति मात्र से अपराध जगत में डर और खामोशी फैल जाती है। लेकिन वहीं, आम लोगों के लिए वे एक साथी की तरह हैं—जो सुनता है, समझता है और उनकी सुरक्षा के लिए हर संभव कदम उठाता है। जिले में कानून-व्यवस्था को नया आयाम देने में उनका योगदान न केवल सख्ती में है, बल्कि मानवता और संवाद में भी है। उनके लिए हर केस सिर्फ नियमों का पालन नहीं, बल्कि इंसानियत की कसौटी भी है। यही संतुलन उन्हें उस अफसर में बदलता है, जिसे अपराध भी सम्मान के साथ देखता है और नागरिक भरोसे के साथ।

जशपुर में उनके नेतृत्व ने कानून–व्यवस्था को नए आयाम पर पहुँचाया है। उनका यह जशपुर मॉडल दिखाता है कि सख्ती और मानवता साथ–साथ चल सकती हैं।
IPS Shashimohan Singh Biography: – जशपुर। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के गृह जिले जशपुर की कानून–व्यवस्था आज जिस अफसर के नेतृत्व में आकार ले रही है, उनका जीवन किसी एक पहचान में बंधा नहीं है। क्लासरूम में हिंदी साहित्य पढ़ाने वाला शिक्षक, नक्सल बेल्ट में बटालियन संभालने वाला कमांडेंट, बड़े परदे पर “वर्दी वाला गुंडा” का नायक और भीतर से संवेदनशील कवि–लेखक — आईपीएस शशिमोहन सिंह का सफर इस बात की मिसाल है कि वर्दी पहनने वाला अफसर सिर्फ कानून लागू नहीं करता, बल्कि समाज को समझने और बदलने की कोशिश भी करता है।
बिहार के बक्सर जिले के दुल्लहपुर गांव से निकलकर भिलाई की गलियों, दुर्ग के कॉलेज, साजा के क्लासरूम और फिर मध्यप्रदेश–छत्तीसगढ़ की थानों व नक्सल इलाकों तक फैला उनका जीवनवृत्त एक अफसर की नहीं, बल्कि एक बहुस्तरीय व्यक्तित्व की कहानी है।
बचपन, जड़ें और संस्कार
शशिमोहन सिंह का जन्म अनुशासन और सादगी से भरे परिवार में हुआ। पिता स्वर्गीय कृष्णदेव सिंह, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) में थे, जिससे घर में अनुशासन और देशसेवा की भावना स्वाभाविक रूप से रची–बसी रही। माँ स्वर्गीय चंदा देवी सिंह गृहिणी थीं, लेकिन उनके संस्कारों ने बेटे के भीतर संवेदना और मानवीय दृष्टि विकसित की।
पैतृक गांव दुल्लहपुर (सेमरी थाना, बक्सर) होते हुए बचपन का बड़ा हिस्सा भिलाई में बीता। प्रारंभिक शिक्षा भिलाई और दुल्लहपुर में हुई। हाईस्कूल और हायर सेकेंडरी की पढ़ाई उन्होंने लोक भारती स्कूल, रामनगर से पूरी की। आगे चलकर दुर्ग के कल्याण कॉलेज से स्नातक और हिंदी साहित्य में परास्नातक की पढ़ाई की — यही वह दौर था, जिसने उन्हें भाषा, अभिव्यक्ति और रचनात्मकता से गहराई से जोड़ा।
क्लासरूम से खाकी तक का सफर
साल 1992 में शशिमोहन सिंह ने साजा कॉलेज में तदर्थ हिंदी व्याख्याता के रूप में अध्यापन शुरू किया। लेकिन शिक्षक की भूमिका निभाते हुए भी उनका सपना प्रशासनिक सेवा का था। पढ़ाने के साथ–साथ उन्होंने लोक सेवा आयोग की तैयारी जारी रखी और 1996 में मध्यप्रदेश पीएससी परीक्षा में सफलता प्राप्त कर डीएसपी बने।

1997 बैच डीएसपी के रूप में उनकी पहली पोस्टिंग होशंगाबाद जिले के शिवपुर थाना प्रभारी के रूप में हुई। इसके बाद वे सीएसपी इटारसी, भोपाल में 23वीं बटालियन के असिस्टेंट कमांडेंट, और फिर नवगठित छत्तीसगढ़ राज्य में भानुप्रतापपुर एसडीओपी बने। आदिवासी अंचल और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में काम करते हुए उन्होंने फील्ड पुलिसिंग की असली चुनौतियाँ समझीं।

रायपुर में सीएसपी पुरानी बस्ती, मुख्यमंत्री सुरक्षा, और फिर सीएसपी सिविल लाइंस जैसे पदों ने उन्हें प्रशासनिक और राजनीतिक समन्वय का अनुभव दिया। प्रमोशन के बाद एडिशनल एसपी कवर्धा और रायपुर के रूप में उनकी पहचान एक सख्त लेकिन संतुलित अफसर की बनी।
वर्दी से फिल्मों के सामने
अप्रैल 2010 से अप्रैल 2012 तक शशिमोहन सिंह ने दो साल का अवकाश लेकर फिल्मों की दुनिया में कदम रखा। यह महज शौक नहीं, बल्कि उनकी रचनात्मक आत्मा की अभिव्यक्ति थी।
उन्होंने चार छत्तीसगढ़ी फिल्मों — मया दे दे मयारू, माटी के लाल, सलाम छत्तीसगढ़, बैरी के मया — में अभिनय किया। भोजपुरी फिल्म “वर्दी वाला गुंडा” में निरहुआ के साथ पुलिस अधिकारी की भूमिका ने उन्हें देशभर में पहचान दिलाई।
खेसारी लाल के साथ दिल ले गई ओढ़निया वाली और राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त छत्तीसगढ़ी फिल्म भूलन द मेज (जेलर की भूमिका) उनके अभिनय के महत्वपूर्ण पड़ाव रहे।
शॉर्ट फिल्म कोटपा को राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम पुरस्कार मिला। थिएटर में सिसकियां और मुखबिर जैसे नाटकों ने उनके सामाजिक सरोकारों को मंच दिया।
आईपीएस अवार्ड और नक्सल बेल्ट की कमान

अप्रैल 2012 में वे फिर वर्दी में लौटे। राजनांदगांव (तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का जिला) में लगभग पाँच साल एडिशनल एसपी रहे। इसके बाद दुर्ग, फिर चंद्रखुरी पुलिस अकादमी में एसपी बने।
साल 2018 में उन्हें आईपीएस अवार्ड मिला और 2012 बैच आईपीएस कैडर प्रदान किया गया।
बाद के वर्षों में वे दंतेवाड़ा 9वीं बटालियन, जगदलपुर बटालियन और रायगढ़ बटालियन के कमांडेंट रहे। बस्तर एसपी के सीबीआई डेपुटेशन पर जाने के बाद उन्हें जगदलपुर का प्रभारी एसपी बनाया गया — यह उनके अनुभव और भरोसे का प्रमाण था।
जशपुर में अभियान आधारित पुलिसिंग
मुख्यमंत्री के गृह जिले जशपुर की कमान संभालते ही आईपीएस शशिमोहन सिंह ने साफ कर दिया कि यहां पुलिसिंग सिर्फ कागजों में नहीं, मैदान में दिखाई देगी।
ऑपरेशन शंखनाद
मवेशी तस्करी पर सबसे बड़ा प्रहार —
• 217 तस्कर गिरफ्तार
• 63 वाहन जब्त, जिनमें से 24 राजसात
• 1,000 से अधिक मवेशी बचाए गए
जनभागीदारी से इस अभियान ने पुलिस पर लोगों का भरोसा बढ़ाया।
ऑपरेशन आघात
अवैध शराब कारोबार पर करारा वार —
• 27,000 लीटर से अधिक शराब जब्त
• 545 आबकारी प्रकरण
• 568 आरोपी गिरफ्तार
ऑपरेशन अंकुश
लंबे समय से फरार अपराधियों की धरपकड़ —
• 68 फरार अपराधी गिरफ्तार
• सभी को न्यायालय में पेश किया गया
ऑपरेशन मुस्कान
संवेदनशील पुलिसिंग की पहचान —
• 68 गुमशुदा नाबालिग बालिकाएँ खोजी गईं
• कानूनी प्रक्रिया के बाद परिजनों को सौंपा गया
इन अभियानों ने जशपुर में डर नहीं, भरोसे वाली पुलिसिंग की नींव रखी।
कवि, लेखक और इंसान
उनकी पुस्तकें “लहरों के उस पार भी तुम हो” और “अनगढ़ दुनिया गढ़े तराशे” उनके भीतर के संवेदनशील व्यक्ति को उजागर करती हैं। वे मानते हैं कि पुलिसिंग सिर्फ लाठी–डंडे से नहीं, संवेदना से भी चलती है।
आईपीएस शशिमोहन सिंह केवल एक अफसर नहीं, बल्कि एक चलता–फिरता अनुभव हैं — जहाँ वर्दी, मंच, कविता और फील्ड एक साथ मौजूद हैं।
उनका जीवन यह बताता है कि अगर नीयत साफ हो और संवेदना जीवित रहे, तो वर्दी सत्ता नहीं, सेवा का प्रतीक बन सकती है।

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