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Bilaspur Highcourt News:–20 साल साथ रहने के बाद अलग हुए पति- पत्नी,हाईकोर्ट में समझौते से मिला तलाक,पत्नी को 51 लाख एलुमनी, बेटियों के लिए 15-15 लाख की FD

Bilaspur Highcourt News:– छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 20 साल पुराने वैवाहिक विवाद में पतिपत्नी को आपसी सहमति से तलाक की अनुमति दी। मध्यस्थता में हुए समझौते के तहत पति पत्नी को 51 लाख रुपये एलुमनी देगा और दोनों बेटियों के लिए 15-15 लाख रुपये की एफडी कराई गई है। अदालत ने कहा कि जब सुलह की संभावना खत्म हो जाए तो मामले को लंबित रखना केवल मानसिक पीड़ा बढ़ाता है।

Bilaspur बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में पतिपत्नी के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद को समाप्त करते हुए आपसी सहमति से तलाक की अनुमति दे दी है। अदालत ने दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता में बने समझौते को स्वीकार करते हुए पत्नी को 51 लाख रुपये गुजारा भत्ता और दोनों बेटियों के भविष्य की सुरक्षा के लिए 15-15 लाख रुपये की एफडी कराने पर सहमति को मान्यता दी।

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यह फैसला जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने सुनाया।

मामले के अनुसार महाराष्ट्र के राजोली निवासी व्यक्ति की शादी छत्तीसगढ़ की एक महिला से 21 मई 2006 को हिंदू रीतिरिवाजों से हुई थी। विवाह के कुछ वर्षों बाद दोनों के बीच वैचारिक मतभेद बढ़ने लगे और वे अक्टूबर 2018 से अलगअलग रहने लगे।

पति ने पहले क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका फैमिली कोर्ट में दायर की थी, लेकिन 6 जुलाई 2024 को फैमिली कोर्ट ने क्रूरता साबित नहीं होने के आधार पर इसे खारिज कर दिया। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट का रुख किया।

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मध्यस्थता में बना समझौता

हाईकोर्ट ने मामले को सुलझाने के लिए दंपत्ति को मध्यस्थता केंद्र भेजा। वहां दोनों पक्षों के बीच लंबी बातचीत के बाद 18 अगस्त 2025 को आपसी सहमति से अलग होने का निर्णय लिया गया।

समझौते के तहत पति ने पत्नी को कुल 51 लाख रुपये देने पर सहमति दी। साथ ही दोनों बेटियों के नाम 15-15 लाख रुपये की दो एफडी कराई गई। पत्नी को डिमांड ड्राफ्ट के माध्यम से किस्तों में राशि दी गई और 23 फरवरी 2026 तक शेष 46 लाख रुपये का भुगतान भी पूरा कर दिया गया, जिसे पत्नी ने स्वीकार कर लिया।

सुलह की संभावना खत्म हो तो देरी बढ़ाती है पीड़ा

फैसले में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर मामले का हवाला देते हुए कहा कि जब पति-पत्नी लंबे समय से अलग रह रहे हों और सुलह की संभावना समाप्त हो चुकी हो, तो छह महीने के कूलिंग पीरियड को अनिवार्य रूप से लागू करना जरूरी नहीं है।

अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में और देरी करना केवल दोनों पक्षों की मानसिक पीड़ा बढ़ाने जैसा है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(बी) के तहत तलाक की डिक्री जारी करने का निर्देश दिया।

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Kanha Tiwari

छत्तीसगढ़ के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्होंने पिछले 10 वर्षों से लोक जन-आवाज को सशक्त बनाते हुए पत्रकारिता की अगुआई की है।

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