CG Farji niyukti :-पीएमओ के आदेश रद्दी की टोकरी में व्याख्याता का मार्कशीट निकला फर्जी, अब तक नहीं हुई कार्रवाई

CG Farji niyukti :-टिकरकला के शासकीय स्कूल में पदस्थ व्याख्याता अविनाश राठौर की मार्कशीट विभागीय जांच में फर्जी पाई गई है। शिकायत सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंची थी, जिसके बाद जांच हुई, लेकिन अब तक न तो एफआईआर दर्ज हुई है और न ही सेवा संबंधी ठोस कार्रवाई। मामला फिलहाल उच्च स्तर पर लंबित है, जिससे शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।
बिलासपुर–गौरेला–पेण्ड्रा मरवाही। कहते हैं शिक्षक भविष्य का निर्माता होता है। शिक्षकों की बुनियाद झूठ की पाठशाला से निकले तो भावी पीढ़ियों का, राज्य और विभाग का भला कैसे होगा। यह कहानी नहीं बल्कि एक ऐसे व्याख्याता के फर्जीवाड़े की कहानी है, जिसे आप सुनकर हैरान रह जाएंगे। विभागीय जांच का सिस्टम ऐसा है कि पीएमओ कार्यालय के आदेश के बाद भी अब तक कार्रवाई नहीं हो सकी है।
टिकरकला के स्कूल में व्याख्याता के पद पर अविनाश राठौर पदस्थ हैं। कुछ माह पहले सीधे प्रधानमंत्री के कार्यालय में व्याख्याता राठौर की मार्कशीट फर्जी होने की शिकायत की गई थी। शिकायत जांच के लिए भेजी गई। शिक्षा विभाग ने आवेदन को गंभीरता से लिया और जांच की गई। जांच में मार्कशीट को फर्जी पाया गया है। जिस तत्परता के साथ शिकायत की जांच की गई, उतनी ही तेजी से जांच को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
सर्टिफिकेट निकला फर्जी
विभागीय जांच में सर्टिफिकेट फर्जी पाया गया है। साथ ही नगर पंचायत से नियुक्ति हुई है। अब विभाग यह भी जांच कर रहा है कि नियुक्ति के दौरान क्या व्याख्याता राठौर ने उक्त प्रमाण पत्र का उपयोग किया था या नहीं।
सत्यापन में बड़ी लापरवाही
जब भी शासकीय विभाग में नियुक्तियां होती हैं, नियुक्ति से पहले तमाम दस्तावेजों का सत्यापन स्कूल, कॉलेज और अन्य शैक्षणिक संस्थानों से तथा जाति, निवास सहित अन्य दस्तावेजों का विधिवत रूप से सत्यापन कराना अनिवार्य होता है। व्याख्याता अविनाश राठौर की नियुक्ति में यह बड़ी लापरवाही बरती गई। हो सकता है उस दौरान की भर्तियों में और भी फर्जीवाड़े हुए हों। यह भी संभव है कि अन्य व्याख्याताओं ने इस तरह के फर्जी सर्टिफिकेट का उपयोग कर नौकरी में स्थान पाया हो।
राज्य सरकार का लाखों का नुकसान
एक व्याख्याता को मोटी रकम बतौर वेतन दी जाती है। कितने वर्षों से यदि कोई फर्जी प्रमाण पत्र के सहारे नौकरी कर रहा है, तो उससे राशि की रिकवरी एक बड़ी पेचीदा और चुनौतीपूर्ण कार्य होती है। कोर्ट–कचहरी के चक्कर में लाखों रुपये की रिकवरी फंसकर रह जाती है। ऐसी लापरवाही राज्य सरकार के खजाने को खाली करना तो है ही, साथ ही ऐसे कथित आरोपी शिक्षकों को संरक्षण देना भी है।
अब गेंद डीपीआई के पाले में
किसी भी जांच को अटकाना हो तो उच्च विभागीय जांच का हवाला दे दिया जाता है। जांच हुई, मगर एफआईआर की न तो अनुशंसा की गई और न ही उसे नौकरी से निकालने की दिशा में ठोस कदम उठाया गया। जांच के बाद डीपीआई को रिपोर्ट सौंप दी गई। डीपीआई ने विभागीय जांच पर कुंडली मारकर बैठी है।
क्या कहते हैं अधिकारी
जिला शिक्षा अधिकारी रजनीश तिवारी ने इस विषय में कहा है कि जांच की गई है। सर्टिफिकेट फर्जी पाया गया है। कुछ दस्तावेजों के लिए नगर पंचायत स्तर पर जांच की जा रही है। यदि फर्जी सर्टिफिकेट का उपयोग किया गया होगा तो एफआईआर भी कराई जाएगी।

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