CG News:– एक तरफ करोड़ के धान घोटाले पर प्रशासन ने की नहीं लिया सुध ,दूसरी तरफ टोकन नहीं कटने से परेशान हो टावर पर चढ़ने वाले गरीब किसान को भेजा गया जेल

CG News:– सरकार समर्थन मूल्य पर धान खरीदने के दावे करती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि टोकन नहीं कटने से किसान प्रशासनिक दबाव और एफआईआर का सामना कर रहे हैं।
Janjgir-Champa News:– जांजगीर–चांपा |1 फरवरी 2026 सरकार कहती है कि वह किसानों से धान खरीदेगी। भाषणों में वादा है, काग़ज़ों में योजना है। लेकिन ज़मीन पर वही किसान टोकन के लिए भटक रहा है। और जब वह हारकर सवाल पूछता है, तो जवाब व्यवस्था नहीं देती—कानून दे दिया जाता है।

जांजगीर–चांपा जिले के कसौंदी गांव का किसान अनिल गड़ेवाल कई दिनों से धान बिक्री का टोकन पाने की कोशिश कर रहा था। आवेदन, दफ्तर, कर्मचारियों के चक्कर—सब हो चुका था। सुनवाई नहीं हुई। आखिरकार उसने खेत में लगे करीब 120 फीट ऊंचे हाईटेंशन टावर पर चढ़कर कहा—“टोकन चाहिए, नहीं तो जान दे दूंगा।” यह कोई भाषण नहीं था, यह हताशा थी।
करीब छह घंटे तक वह किसान टावर पर खड़ा रहा। नीचे पुलिस थी, प्रशासन था, गांव था। सब उसे देख रहे थे। इस दौरान तहसीलदार राजकुमार मरावी ने किसान को समझाइश दी कि वह टावर से नीचे उतर आए, उसका टोकन मिल जाएगा। इसी भरोसे पर किसान ने जान जोखिम में डालकर नीचे उतरने का फैसला किया।
लेकिन नीचे उतरते ही तस्वीर बदल गई। जिस टोकन का भरोसा देकर किसान को उतारा गया, वह नहीं मिला। इसके बजाय किसान के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उसे जेल भेज दिया गया।

छत्तीसगढ़ में किसान पर जुर्म दर्ज, सोशल मीडिया पर मचा हंगामा

इस घटना ने सोशल मीडिया पर भी तहलका मचा दिया। RTI एक्टिविस्ट कुणाल शुक्ला और वरिष्ठ खोजी पत्रकार मुकेश एस. सिंह के जांजगीर किसान के वायरल ट्वीट पर प्रतिक्रिया साझा करने के बाद पूरे प्रदेश में हंगामा फैल गया।
https://x.com/kunal492001/status/2017645619775787518?s=48
वहीं इस मामले को लेकर कुणाल शुक्ला ने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा:
“इधर छत्तीसगढ़ में किसान का धान बेचने के टोकन नहीं कट रहा है, कर्ज से परेशान किसान हैरान परेशान हैं।
उधर उस किसान पर ये निरंकुश सरकार जुर्म दर्ज कर देती है जो टोकन काटने की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहा था।”
इस ट्वीट और सोशल मीडिया प्रतिक्रियाओं के बाद राज्य में किसानों और आम नागरिकों में नाराजगी तेजी से बढ़ी है।
यह मामला सिर्फ एक किसान का नहीं है। यह उस व्यवस्था का सवाल है, जिसमें टोकन नहीं कटने की जिम्मेदारी तय नहीं होती, लेकिन हताशा की कीमत किसान से वसूली जाती है। पटवारी और तहसीलदार घर–घर जाकर धान खोजते हैं, लेकिन जब किसान टूटता है, तो उसे अपराधी बना दिया जाता है।
इसी जिले में करोड़ों रुपये के घोटालों की बातें होती हैं। वहां फाइलें चलती हैं, जांच बैठती है, नतीजा नहीं निकलता। लेकिन एक किसान—जिसके पास न रसूख है, न वकील—उसके लिए कार्रवाई तुरंत होती है।
युवा कांग्रेस जिला अध्यक्ष पंकज शुक्ला ने प्रशासन पर किसानों के साथ अन्याय करने का आरोप लगाया और कहा कि सरकार के सुशासन के दावे खोखले हैं। उन्होंने जिम्मेदार अधिकारियों पर तत्काल कार्रवाई की मांग की।
अगर यही सुशासन है, तो सवाल यह है—क्या व्यवस्था की खामियों की कीमत किसान ही भुगतेगा? और कितने किसान अपनी आवाज़ उठाने के लिए टावर पर चढ़ना मजबूर होंगे, जबकि नीचे उन्हें कानून का सामना करना पड़े?

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