CG News:– फटी वर्दी, खामोश सिस्टम— अब मचा बवाल ,महिला पुलिसकर्मी पर हमले के बाद भी जवाबदेही तय नहीं किस नौकरशाह के संरक्षण में टिके हैं कलेक्टर–एसपी?

Raigarh News:– रायगढ़ के तम्नार में 27 दिसंबर को जो हुआ, उसने पूरे छत्तीसगढ़ को झकझोर कर रख दिया। यह कोई सामान्य प्रशासनिक विफलता नहीं थी बल्कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की भाजपा सरकार की संवेदनहीनता, और जवाबदेही की पराजय का प्रतीक बन गया। जिस धरती पर “सुशासन” की गूंज सुनाई देती थी, वहीं एक महिला पुलिसकर्मी की वर्दी तार–तार कर भीड़ ने न केवल कानून बल्कि शासन की आत्मा को नंगा कर दिया। भीड़ के बीच घसीटी गई वह वर्दी छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक सोच और नैतिकता पर लगा वह धब्बा है जो आने वाले समय तक धुल नहीं सकेगा। अब यह सवाल पूरी व्यवस्था से पूछा जा रहा है– क्या शासन ने जनता से संवाद खो दिया है या संवेदनहीनता ही उसकी नई पहचान बन चुकी है?
Raigarh। राज्य स्तर पर तम्नार हिंसा का मामला तब और गरमा गया, जब वरिष्ठ खोजी पत्रकार मुकेश एस. सिंह ने अपने X (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट पर पूरी घटना पर सवाल उठाते हुए पोस्ट साझा किया। उनकी पोस्ट सामने आते ही सोशल मीडिया पर तेज़ प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया और तम्नार प्रकरण को लेकर राज्यव्यापी बहस छिड़ गई।


रायगढ़ जिले के तम्नार क्षेत्र में 27 दिसंबर को जो कुछ हुआ, वह सिर्फ कानून–व्यवस्था की विफलता नहीं था, बल्कि प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया, संवादहीनता और जवाबदेही तंत्र पर गंभीर प्रश्नचिह्न बन गया। यह घटना उस “सुशासन” की कसौटी भी है, जिसकी बार–बार बातें की जाती हैं, लेकिन संकट की घड़ी में उसकी उपस्थिति कहीं नजर नहीं आई।
धरना और हिंसा की शुरुआत:
करीब दो सप्ताह से तम्नार क्षेत्र की 14 ग्राम पंचायतों के ग्रामीण JSPL को आवंटित गारे–पेल्मा सेक्टर–I कोयला परियोजना के खिलाफ शांतिपूर्ण धरना दे रहे थे। ग्रामीणों की मांग टकराव नहीं, बल्कि संवाद और भरोसेमंद चर्चा की थी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार स्थिति तब बिगड़ी, जब कथित रूप से महिला प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किया गया। वरिष्ठ पुलिस अधिकारी इस आदेश से इनकार कर रहे हैं, लेकिन ग्रामीणों का दावा है कि बिना उकसावे के की गई कार्रवाई ने माहौल अचानक विस्फोटक बना दिया।
इसी दौरान प्रशासन ने आसपास की औद्योगिक इकाइयों की ओर वाहनों की आवाजाही सुनिश्चित करने का प्रयास किया। आरोप है कि इस प्रक्रिया में एक ट्रक की चपेट में महिला प्रदर्शनकारी आ गई और उसकी मौत की अफवाह फैल गई। देखते ही देखते आक्रोश ने हिंसक रूप ले लिया। सड़क जाम, पुलिस वाहनों में आग और सरकारी संपत्ति की तोड़फोड़ जैसी घटनाएं हुईं।
महिला पुलिसकर्मी पर हमला:
भीड़ को हटाने के लिए स्थानीय पुलिस ने धक्का–मुक्की और रस्सियों का इस्तेमाल किया, लेकिन बल की कमी के कारण हालात नियंत्रण से बाहर चले गए। इसी बीच एक महिला पुलिस आरक्षक के साथ मारपीट, घसीटने और सार्वजनिक अपमान की घटना सामने आई, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। यह दृश्य न केवल भीड़ की उग्रता दिखाता है, बल्कि यह भी उजागर करता है कि संकट की घड़ी में पुलिस कमांड और सुरक्षा प्रोटोकॉल कितने असफल रहे।
कलेक्टर और SP की भूमिका पर सवाल:
घटना के चरम समय में रायगढ़ के कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी और पुलिस अधीक्षक दिव्यांग कुमार पटेल JSPL गेस्ट हाउस में मौजूद थे। अब तक इस पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं आया, जिससे प्रशासन की निष्पक्षता पर संदेह और गहरा गया। सवाल ये उठता है कि संवेदनशील क्षेत्रों में बल प्रयोग से बचने के निर्देश होते हुए भी तम्नार में ऐसा कदम किसने उठाया और यह निर्णय किस स्तर पर लिया गया।
भूपेश बघेल का बयान:
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बीजेपी सरकार और प्रशासन पर आरोप लगाया कि समय रहते ग्रामीणों से संवाद न करने से हिंसा भड़की तथा प्रशासन उद्योगपतियों के दबाव में आंदोलन दबा रहा है। उन्होंने प्रभावित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने तथा पूरे मामले की न्यायिक जांच की मांग की।
सोशल मीडिया और RTI प्रतिक्रिया:

मुकेश एस. सिंह की दो अलग अलग पोस्ट वायरल होते ही #TamnarHinsa ट्रेंड करने लगा और राज्यव्यापी बहस शुरू हुई। इसके बाद आरटीआई एक्टिविस्ट कुणाल शुक्ला ने ट्वीट कर कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी और SP दिव्यांग कुमार पटेल की जवाबदेही पर सवाल उठाया। शुक्ला ने लिखा कि महिला कांस्टेबल के कपड़े फाड़कर उसे बेरहमी से पीटा गया, और इससे पहले भी जिले में महिला टीआई के साथ मारपीट की घटनाएं हो चुकी हैं।
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https://x.com/kunal492001/status/2007493992062345557?s=46
उन्होंने पूछा कि इतने गंभीर मामलों के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों को हटाया क्यों नहीं गया और इसे संरक्षण कौन दे रहा है—क्या यह महज संयोग है या इसके पीछे किसी बड़े लेन–देन की कहानी छिपी है।
सबक: जवाबदेही तय हो, वरना बार–बार चूक
2 गिरफ्तारियां हुईं, सीएम ने जांच के आदेश दिए। लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों का हिसाब–किताब कब? कवर्धा–बलौदाबाजार की यादें ताजा हैं। तम्नार चेतावनी है—संकट में संवाद, बल की बजाय बातचीत। वर्दी वालों की सुरक्षा पहली प्राथमिकता बने। जब तक जिम्मेदारी तय न हो, सुशासन सिर्फ किताबी बात रहेगा। लोगो का सवाल जायज है—क्या अब भी आंखें बंद रहेंगी?
तमाम सफाइयों, बयानबाज़ी और औपचारिक जांच के दावों के बीच असली सवाल वहीं का वहीं खड़ा है—आखिर कुणाल शुक्ला किस नौकरशाह से इशारा कर रहे हैं और वही नौकरशाह है जिसके संरक्षण में कलेक्टर व एसपी की कुर्सियां मज़बूती से जमी हुई हैं? यह महज एक जिले की नाकामी नहीं, बल्कि उस गुप्त संरक्षक तंत्र का पर्दाफाश है जो वर्दी की बेइज्जती, महिला पुलिसकर्मी के अपमान और बार–बार लापरवाही के बावजूद जवाबदेही से बच रहा। जब तक इस चक्र का चेहरा न बेनकाब हो, तम्नार की हिंसा, फटी वर्दी और घायल जवानों की तस्वीरें छत्तीसगढ़ की व्यवस्था से चीख–चीखकर यही पूछेंगी—किसके इशारे पर, किसकी ढाल में, किसकीमत पर?

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