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CG News:– एक साल बाद भी नहीं खुला सांसद का जनदर्शन कार्यालय, जनता बोली: 60 किलोमीटर दूर जाकर भी नहीं होती सुनवाई

लोकतंत्र में सांसद जनता का प्रतिनिधि होता है, लेकिन जब वही प्रतिनिधि जनता से दूर होता चला जाए, तो सवाल उठना लाज़मी है। जांजगीर-चांपा लोकसभा क्षेत्र में यही सवाल अब खुलकर सामने आ रहा है।

Janjgir News:– जांजगीर-चांपा | लोकसभा की सांसद कमलेश जांगड़े को पद संभाले एक वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन अब तक लोकसभा मुख्यालय जांजगीर-चांपा में जनदर्शन कार्यालय नहीं खोला गया है। इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ रहा है, जिसे अपनी समस्याएं बताने के लिए 60 किलोमीटर दूर सांसद के गृह ग्राम तक जाना पड़ता है।

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दूर जाकर भी नहीं होती सुनवाई

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि गृह ग्राम पहुंचने के बाद भी तो सांसद से मुलाकात सुनिश्चित होती है और ही उनकी समस्याओं पर कोई स्पष्ट जानकारी या आश्वासन ही मिलता है।
इस प्रक्रिया में जनता का समय और पैसा दोनों बर्बाद हो रहे हैं।

जनदर्शन कार्यालय नहीं होने के कारण जिला मुख्यालय में लोगों की समस्याएं लंबित होती जा रही हैं और असंतोष लगातार बढ़ रहा है।

सांसद से बढ़ती दूरी, जनता में नाराजगी

जनता का आरोप है कि सांसद कमलेश जांगड़े लगातार आम लोगों से दूरी बना रही हैं। लोगों का यह भी कहना है कि उन्हें जनता की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है, यही वजह है कि वे जिला मुख्यालय में बैठकर समस्याओं का सामना करने से बचती हैं।

अब यह नाराजगी केवल बातचीत तक सीमित नहीं है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वे इस पूरे मामले की शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक करने की तैयारी में हैं।

कुर्सी मिलने के बाद कार्यकर्ता की पहचान भूल गईं?

आमजन यह भी याद दिला रहे हैं कि सांसद कमलेश जांगड़े कभी एक साधारण पार्टी कार्यकर्ता थीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे और जनता के भरोसे वे संसद तक पहुंचीं, लेकिन अब सत्ता मिलने के बाद वही जनता खुद को ठगा महसूस कर रही है।

बताया जा रहा की सांसद की उपस्थिति केवल शासकीय बैठकों निजी आयोजनो औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित रह गई है। जिला मुख्यालय में बैठकर आम जनता की समस्याएं सुनते हुए उन्हें अब तक शायद ही किसी ने देखा हो।

जिले की समस्याओं से भी अनजान?

स्थानीय लोगों का कहना है कि सांसद को अभी तक जिले की बुनियादी समस्याओं की भी पूरी जानकारी नहीं है। न रोजगार, न स्वास्थ्य, न शिक्षा— किसी मुद्दे पर ठोस संवाद नजर नहीं आता।

सक्ती में अधिक समय, जांजगीरचांपा उपेक्षित

  आउटर कॉलोनियों में पुलिस का छापा

बताया जा रहा है कि सांसद का गृह निवास सक्ती जिले में होने के कारण वे अधिकतर समय वहीं रहती हैं। जांजगीरचांपा लोकसभा मुख्यालय की उपेक्षा ने जनता को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या सांसद मान चुकी हैं कि पांच साल तक उनकी कुर्सी सुरक्षित है?

इतिहास गवाह है

लोग यह भी याद दिला रहे हैं कि इससे पहले भी कई सांसद सत्ता में रहते हुए जनता से कट गए थे। नतीजा यह हुआ कि कार्यकाल पूरा होते-होते वे “न घर के रहे, न घाट के” आज वे न जनता में दिखते हैं, न पार्टी में उनकी पूछ बची है।

अब जनता हिसाब मांगेगी

जांजगीरचांपा की जनता का कहना है कि आने वाले समय में इस उपेक्षा का राजनीतिक और लोकतांत्रिक हिसाब जरूर लिया जाएगा। जनता यह भी साफ कर चुकी है कि यदि जिला मुख्यालय में जल्द जनदर्शन कार्यालय नहीं खोला गया, तो मामला PMO तक पहुंचाया जाएगा।

पार्टी के भीतर भी असंतोष, लेकिन खुलकर विरोध नहीं

बताया जा रहा है कि आमजन के साथ सांसद के इस रवैये को लेकर पार्टी के भीतर भी असंतोष लगातार गहराता जा रहा है। संगठन से जुड़े कई वरिष्ठ और जमीनी स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ताओं का मानना है कि जिला मुख्यालय में जनदर्शन कार्यालय न खोलना पार्टी की कार्यसंस्कृति और जमीनी राजनीति की मूल भावना के खिलाफ है।

हालांकि, संस्कारी पार्टी की गरिमा, अनुशासन और नेतृत्व के प्रति निष्ठा के कारण पार्टी के अधिकतर नेता और कार्यकर्ता खुलकर विरोध दर्ज कराने से परहेज कर रहे हैं। अंदरखाने यह चिंता जरूर जताई जा रही है कि जनता से बढ़ती दूरी पार्टी की छवि और विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचा रही है, लेकिन कोई भी इसे सार्वजनिक मंच पर कहने से बच रहा है।

पार्टी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले समय में इसका असर केवल जनाधार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संगठनात्मक मजबूती और कार्यकर्ता-आधार पर भी साफ दिखाई देगा।

आमजन यह भी याद दिला रहे हैं कि सांसद कमलेश जांगड़े कभी एक साधारण पार्टी कार्यकर्ता थीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे और जनता के भरोसे वे संसद तक पहुंचीं, लेकिन अब सत्ता मिलने के बाद वही जनता खुद को उपेक्षित महसूस कर रही है। लोकतंत्र में कुर्सी अस्थायी होती है,लेकिन जनता की नाराजगी—बहुत दूर तक याद रखी जाती है।

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Kanha Tiwari

छत्तीसगढ़ के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्होंने पिछले 10 वर्षों से लोक जन-आवाज को सशक्त बनाते हुए पत्रकारिता की अगुआई की है।

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