26 साल पुरानी रजिस्ट्री घोटाले से पुलिसिया मिलीभगत उजागर 7महीने तक दबा रहा केस, SSP की फटकार ने खोली लापरवाही की पोललेखक सलाखों के पीछे, दलाल फरार; SHO पर भी उठे जवाबदेही के सवाल

सात महीने तक एएसआई दबाए रहा शिकायत, एसएसपी की फटकार के बाद दर्ज हुआ केस
बिलासपुर। जमीन की रजिस्ट्री के दस्तावेज में छेड़छाड़ कर 26 साल पहले की गई ठगी का मामला अब सामने आया है। इस प्रकरण को थाने में पदस्थ एएसआई ने सात महीने तक दबाकर रखा था। शिकायतकर्ता को गुमराह करने आरोपी ने भी एक आवेदन पुलिस को दे दिया था। मामला जब एसएसपी रजनेश सिंह की जानकारी में आया तो उन्होंने एएसआई को तत्काल हटा दिया और अपनी निगरानी में जांच कराई। इसके बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर दस्तावेज लेखक को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि मुख्य आरोपित जमीन दलाल और उसका साथी फरार हैं।
नागपुर निवासी अरुण कुमार दुबे ने इस धोखाधड़ी की शिकायत की थी। उन्होंने बताया कि वर्ष 1999 में जब वे एसईसीएल जमुना–कोतमा एरिया में सुरक्षा अधिकारी पद पर पदस्थ थे, तब उन्होंने मोपका स्थित रामफल कैवर्त की जमीन सुरेश मिश्रा से खरीदी थी। तभी से वे जमीन पर कब्जा कर रहे थे। कुछ महीने पहले उन्होंने उक्त जमीन की रजिस्ट्री सावित्री देवी राठौर के नाम कर दी। सावित्री देवी ने नामांतरण के लिए तहसील कार्यालय में आवेदन दिया तो इस दौरान सुरेश मिश्रा ने दूसरी रजिस्ट्री की कापी प्रस्तुत कर आपत्ति जता दी।
शिकायतकर्ता ने जब जांच कराई तो बड़ा खुलासा हुआ। पता चला कि सुरेश मिश्रा ने वर्ष 1999 में ही धोखाधड़ी की थी। रजिस्ट्री की कार्बन कापी में उसने असली खसरा नंबर की जगह दूसरा नंबर लिख दिया था। इस छेड़छाड़ के कारण आज वास्तविक खरीदार को परेशानी उठानी पड़ रही है।
अरुण कुमार की शिकायत पर पुलिस जांच में दस्तावेज लेखक महेंद्र सिंह ठाकुर (50) की भूमिका सामने आई। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है। वहीं, मुख्य आरोपित सुरेश मिश्रा और उसका साथी फरार बताए जा रहे हैं। उनकी तलाश में पुलिस संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही है।
क्या वाकई थाना प्रभारी अनजान थे?
थाने में लंबित आवेदन और शिकायतों की जानकारी थाना प्रभारी तक न पहुंचे, यह मानना मुश्किल है। सात महीने तक एक गंभीर शिकायत दबाकर रखी गई और थाना प्रभारी निलेश पांडेय को भनक तक न लगी हो—यह सवाल सीधे उनकी कार्यशैली और जिम्मेदारी पर चोट करता है। अगर वे सचमुच अनजान थे, तो यह उनकी निगरानी क्षमता की बड़ी नाकामी है। पुलिसिंग में यह बहाना नहीं चलता कि “पता नहीं चला”, क्योंकि हर आवेदन की जवाबदेही आखिर थाना प्रभारी की ही होती है।
एएसआई पर पूरा ठीकरा क्यों?
एएसआई को तुरंत हटाकर कार्रवाई करना भले ही पहली नजर में कठोर कदम लगे, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई असल जिम्मेदारी से बचने का रास्ता है? क्या एएसआई को “बलि का बकरा” बना दिया गया, ताकि थाना प्रभारी की भूमिका पर पर्दा डाला जा सके? सात महीने तक दस्तावेज दबे रहने में अकेले एएसआई ही दोषी था या फिर थाना प्रभारी ने जानबूझकर आंखें मूंद रखी थीं—जांच का सबसे बड़ा सवाल यही है।
जवाबदेही का बड़ा सवाल
यह मामला महज़ एएसआई की लापरवाही तक सीमित नहीं है। यह पूरे थाना सिस्टम और उसकी जवाबदेही पर उंगली उठाता है। अगर जांच सिर्फ एएसआई तक सीमित रही, तो यह साफ संदेश होगा कि बड़े अफसर जिम्मेदारी से बच सकते हैं और छोटा स्टाफ ही निशाने पर रहेगा। निष्पक्ष जांच तभी मानी जाएगी, जब थाना प्रभारी की भूमिका भी उतनी ही गंभीरता से परखी जाए।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए एएसआई की लापरवाही की जांच भी की जा रही है। सात महीने तक शिकायत दबाए रखने और आरोपियों को फायदा पहुंचाने की वजह से विभागीय कार्रवाई की संभावना भी बन गई है।
संपादकीय : टिप्पणी..
यह मामला सिर्फ जमीन ठगी का नहीं, बल्कि पुलिस तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी सवाल खड़ा करता है। जहां 26 साल पहले की गई एक छोटी सी हेरफेर आज खरीदार को परेशानी में डाल रही है, वहीं थाने में 7 महीने तक दबे रहने वाली शिकायत ने पुलिस की कार्यप्रणाली को कटघरे में ला दिया है। SSP के हस्तक्षेप के बाद कार्रवाई शुरू हुई, लेकिन अब नजरें इस बात पर हैं कि फरार आरोपितों की गिरफ्तारी कब होगी और SHO पर क्या कार्रवाई होती है।
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