हाथ जोड़ते ही डगमगाई कुर्सी

बिलासपुर. कप्तान ने बार-बार समझाया था— “अपराधियों पर शिकंजा कसो और वर्दी पर दाग मत लगने दो।” लेकिन कुछ थानेदार तो मानो कान में रुई डालकर बैठे थे। तीज पर्व पर सामने आई एक तस्वीर ने ऐसा हंगामा मचाया कि कप्तान साहब का पारा चढ़ गया। मुख्यालय तक गूंज पहुंची और साहब ने बिना सोचे-विचारे थानेदार की कुर्सी खींच डाली। अब बेचारे मातहत अफसर नए-नए बहाने गढ़कर अपनी गर्दन बचाने की जुगत में हैं।
चुगली का तड़का, थाने में खलबली
जिले के एक थाने में इन दिनों मसाला फिल्म से ज्यादा ड्रामा चल रहा है। हुआ यूं कि किसी ने थानेदार की करतूतों की चिट्ठी कप्तान तक पहुंचा दी। मामला पैसों का था, तो कप्तान ने डांट की बरसात कर दी। अब गुस्से में थानेदार ने पूरा स्टाफ लाइन से खड़ा कर दिया— “किसने चुगली की?” हवलदार से लेकर सिपाही तक सबकी आंखें नीचे, चेहरे पर पसीना। हालात ऐसे जैसे क्लासरूम में सबने नकल की हो और मास्टरजी बस एक कॉपी ढूंढ रहे हों। स्टाफ आपस में आंख मार–मारकर इशारे कर रहा था— “भाई, अगर छुट्टी ले लेते तो ये खिचड़ी न पकती।”
पावर स्टेशन वाला थाना
पावर हाउस के पास वाले थाने का हाल तो और मजेदार है। वहां थानेदार की गद्दी किसी मिनी पावर स्टेशन जैसी है। फर्क इतना कि वहां बिजली नहीं, बल्कि हुक्मनामे और रौब सप्लाई होते हैं। साहब खुद कूलिंग मोड में बैठे रहते हैं और पूरा स्टाफ 440 वोल्ट में काम करता है। यहां कानून की धाराएं साहब नहीं, बल्कि स्टाफ लिखता है। जैसे पंचायत में सरपंच मौन व्रत पर बैठा हो और पंच ही फैसले सुना दें। हर स्टाफ अपने को पावर मिनिस्टर समझता है। पर मजाल है कि राज थाने से बाहर न निकले। लेकिन फिर भी कबाड़ा ऐसा होता है कि मामला सीधे कप्तान तक पहुंच जाता है।
थाना या कॉरपोरेट ऑफिस?
शहर का दूसरा बड़ा थाना तो किसी फिल्मी ऑफिस सेट जैसा लगता है। यहां दो–दो थाने एक साथ चलते हैं। असली रिमोट कहीं और से ऑपरेट होता है, और चैनल बदलते रहते हैं। थानेदार ने अपनी सेकेंड लाइन को इतना मजबूत कर रखा है कि बड़े–बड़े मामले उसी टेबल पर निपटा दिए जाते हैं। जमीन–जायदाद वाले विवादों के लिए तो अलग “स्पेशलिस्ट डॉक्टर” नियुक्त है— जो बिना शोर किए पीड़ित और आरोपी दोनों का इलाज कर बाहर भेज देता है। सीन ऐसा कि सामने की कुर्सी पर पीड़ित, बगल में आरोपी, और बीच वाली कुर्सी पर “डील” फाइनल।
Live Cricket Info

