

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने करीब 26 साल पुराने एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए तत्कालीन सब रजिस्ट्रार के खिलाफ जारी सजा के आदेश को रद्द कर दिया है। जस्टिस संजय के. अग्रवाल की सिंगल बेंच ने कहा कि पंजीयन अधिकारी का काम केवल दस्तावेज के निष्पादन और पक्षकारों की पहचान सुनिश्चित करना है, न कि जमीन के (मालिकाना हक की जांच करना।
वर्ष 1994 में अंबिकापुर में पदस्थ तत्कालीन सब-रजिस्ट्रार केपी. वर्मा ने दो सेल डीड का पंजीयन किया था। आरोप था कि उन्होंने कलेक्टर की अनुमति के बिना शासकीय पट्टे की भूमि का पंजीयन कर दिया, जो भू-राजस्व संहिता की धारा 165 (7-ख) का उल्लंघन है। इसके अलावा, उन पर दूसरा आरोप यह था कि उन्होंने पक्षकारों के घर जाकर पंजीयन की सुविधा दी, जबकि पक्षकार कार्यालय आने में सक्षम थे। इस मामले में विभाग ने जांच के बाद सब-रजिस्ट्रार की 3 वेतन वृद्धियां रोकने की सजा दी थी। इस फैसले के खिलाफ की गई अपील भी वर्ष 2018 में खारिज हो गई थी, जिसके बाद वर्मा ने हाई कोर्ट में याचिका लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और पंजीयन अधिनियम की धाराओं का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा 34 (3) के तहत अधिकारी को यह देखना है कि दस्तावेज किसने निष्पादित किया उसकी पहचान सही है।
शासकीय पट्टा राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं:–
हाईकोर्ट ने पाया कि जिस समय पंजीयन हुआ, राजस्व रिकॉर्ड में कहीं भी यह दर्ज नहीं था कि वह जमीन शासकीय पट्टे की है। इसी तरह धारा 31 के तहत पंजीयन अधिकारी को यह विवेकाधीन शक्ति प्राप्त है कि विशेष कारणों के चलते वह पक्षकार के निवास पर जाकर दस्तावेज स्वीकार कर सके।

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