JanjgirChampa News:- शासन से आवंटन नहीं, फिर भी शासकीय आवास पर कब्जा—किसके आदेश पर? डाईट में गरमाया विवाद, जिम्मेदार कौन? जबकि डीएड छात्र-छात्राएं आवास के अभाव में किराए के कमरों में रहने को मजबूर

JanjgirChampa News:- डाईट में शासकीय आवास पर कब्जे का विवाद प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है। शासन से आवंटन का आदेश न होने के बावजूद भवन के उपयोग ने व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। प्राचार्य बी.पी. साहू ने स्पष्ट निर्देश जारी कर मार्गदर्शन मिलने तक उपयोग पर रोक लगाने को कहा है, जबकि डीएड के छात्र-छात्राएं आवास के अभाव में किराए के कमरों में रहने को मजबूर हैं। यह मामला अब जिम्मेदारों की जवाबदेही और प्रशासन की निष्पक्षता की परीक्षा बन गया है।
JanjgirChampa:- जांजगीर चांपा। जिला मुख्यालय जांजगीर स्थित शासकीय जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डाईट) के शासकीय आवास पर कब्जे का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। एक ओर जहां डीएड प्रशिक्षण ले रहे छात्र-छात्राओं को आवास की सुविधा नहीं मिल पा रही है और वे किराए के मकानों में रहने को मजबूर हैं, वहीं दूसरी ओर संस्थान के शासकीय आवास के उपयोग को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।
इस मामले में डाईट के प्राचार्य बीपी साहू द्वारा जारी एक पत्र सामने आया है, जिसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि भवन आवंटन के संबंध में अभी तक शासन स्तर से कोई अंतिम आदेश प्राप्त नहीं हुआ है। प्राचार्य साहू ने पत्र के माध्यम से संबंधित महिला नेत्री/संस्था को निर्देश दिया है कि मार्गदर्शन प्राप्त होने तक भवन का उपयोग करना उचित नहीं है।पत्र के अनुसार कलेक्टर जांजगीर-चांपा के पत्र के संदर्भ में प्रेमा एजुकेशन एंड सोशल वेलफेयर सोसायटी को एक क्वार्टर आवंटित करने के संबंध में पत्र प्राप्त हुआ था। इसके बाद भवन आवंटन के लिए संचालक, राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद रायपुर को पत्र भेजकर मार्गदर्शन मांगा गया है, लेकिन अभी तक कोई स्पष्ट निर्देश प्राप्त नहीं हुआ है। प्राचार्य साहू ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया है कि जब तक शासन स्तर से मार्गदर्शन प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक भवन का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। इधर, इस पूरे मामले को लेकर शहर में चर्चा तेज हो गई है। लोगों का कहना है कि जब भवन का आवंटन ही शासन स्तर से नहीं हुआ है, तो फिर वहां निवास और उपयोग किस आधार पर किया जा रहा है। इस मामले ने एक बार फिर प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह होगा कि विभागीय अधिकारी इस पूरे मामले में क्या कदम उठाते हैं और शासकीय आवास के उपयोग को लेकर क्या निर्णय लिया जाता है।




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