CG News:- जालसाजी के मामलों को सुलझाने में फिसड्डी साबित हो रही रेंज साइबर पुलिस,रेंज साइबर थाना आखिर किस काम का?

CG News:-बिलासपुर। सरकार ने साइबर ठगी पर लगाम लगाने के लिए रेंज साइबर थाना बनाया था, लेकिन सवाल यह है कि जब हर महीने डिजिटल अरेस्ट, फर्जी ट्रेडिंग, क्रिप्टो निवेश और ऑनलाइन जॉब के नाम पर लोग लाखों रुपये गंवा रहे हैं, तब आखिर साइबर जालसाजों तक पुलिस क्यों नहीं पहुंच पा रही? अधिकांश मामलों में न ठगी की रकम वापस हो रही है, न आरोपी गिरफ्तार हो रहे हैं। जांच में देरी, तकनीकी कार्रवाई की धीमी रफ्तार और बढ़ती शिकायतों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या रेंज साइबर थाना साइबर अपराधियों से एक कदम पीछे चल रहा है, या फिर उसे और संसाधनों व जवाबदेही की जरूरत है?
Bilaspur बिलासपुर। साइबर ठगी के लगातार बढ़ते मामलों पर अंकुश लगाने और पीड़ितों को राहत दिलाने के लिए राज्य सरकार ने रेंज स्तर पर साइबर थानों की स्थापना की थी। उम्मीद थी कि स्पेशल टीम आधुनिक तकनीक की मदद से ऑनलाइन ठगी के मामलों का तेजी से पर्दाफाश करेगी, लेकिन बिलासपुर रेंज साइबर थाने का प्रदर्शन अब सवालों के घेरे में है। बिलासपुर सहित आसपास के जिलों में हर महीने साइबर ठगी के कई मामले सामने आ रहे हैं। निवेश के नाम पर धोखाधड़ी, फर्जी ट्रेडिंग ऐप, ओटीपी और केवाईसी अपडेट के बहाने बैंक खातों से रकम उड़ाने, सोशल मीडिया हैकिंग और डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराध लगातार बढ़ रहे हैं। इसके बावजूद अधिकांश मामलों में पीड़ितों को न तो उनकी राशि वापस मिल पा रही है और न ही आरोपियों तक पुलिस पहुंच पा रही है। शुरुआती कुछ मामलों में कार्रवाई के बाद रेंज साइबर पुलिस की सक्रियता अपेक्षित स्तर पर दिखाई नहीं दे रही है। कई मामलों में जांच लंबी खिंच रही है, जबकि पीड़ित महीनों तक कार्रवाई का इंतजार करते रहते हैं। इससे लोगों का भरोसा भी प्रभावित हो रहा है। साइबर अपराधों की जांच में बैंक, टेलीकॉम कंपनियों और विभिन्न राज्यों की एजेंसियों से समन्वय की आवश्यकता होती है। ऐसे में तकनीकी संसाधनों और विशेषज्ञ मानवबल को और मजबूत करने की जरूरत महसूस की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि साइबर अपराधियों के नेटवर्क तक पहुंचने के लिए लगातार तकनीकी प्रशिक्षण और आधुनिक जांच प्रणाली का उपयोग आवश्यक है। शहर में लगातार सामने आ रहे साइबर ठगी के मामलों ने यह संकेत दिया है कि अपराधी नए-नए तरीके अपनाकर लोगों को निशाना बना रहे हैं। ऐसे समय में रेंज साइबर थाने से तेज, प्रभावी और परिणाम आधारित कार्रवाई की अपेक्षा की जा रही है। लोगों का मानना है कि यदि मामलों का शीघ्र खुलासा हो और ठगी की रकम की रिकवरी बढ़े, तभी साइबर थाने की स्थापना का उद्देश्य पूरी तरह सफल माना जाएगा।
हर महीने बढ़ रहे साइबर ठगी के मामले
बिलासपुर और आसपास के जिलों में साइबर ठगी का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। पहले ओटीपी और एटीएम फ्रॉड के मामले अधिक सामने आते थे, लेकिन अब अपराधियों ने अपने तरीके बदल दिए हैं। डिजिटल अरेस्ट, फर्जी शेयर ट्रेडिंग, क्रिप्टो निवेश, टेलीग्राम टास्क, ऑनलाइन पार्ट-टाइम जॉब, सोशल मीडिया हैकिंग और फर्जी कस्टमर केयर के जरिए लोगों को ठगा जा रहा है। हर महीने बड़ी संख्या में लोग लाखों रुपये गंवा रहे हैं। पुलिस जागरूकता अभियान भी चला रही है, लेकिन अपराधी नई तकनीकों का इस्तेमाल कर लोगों को जाल में फंसा रहे हैं। जागरूकता के साथ-साथ साइबर अपराधियों के नेटवर्क तक पहुंचकर उनके खिलाफ तत्काल कार्रवाई करना भी जरूरी है। जब तक बड़े गिरोहों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक साइबर ठगी पर अंकुश लगाना मुश्किल रहेगा।
देरी से जांच, पीड़ितों को नहीं मिल रही राहत
साइबर ठगी के मामलों में शुरुआती 24 से 48 घंटे सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यदि इस दौरान बैंक खातों को फ्रीज करा दिया जाए और लेन-देन की ट्रैकिंग तेज कर दी जाए तो ठगी गई रकम वापस मिलने की संभावना काफी बढ़ जाती है। लेकिन कई मामलों में जांच की प्रक्रिया धीमी होने से रकम अलग-अलग खातों में स्थानांतरित होकर निकाल ली जाती है। पीड़ितों का कहना है कि शिकायत दर्ज कराने के बाद भी उन्हें लंबे समय तक जांच की प्रगति की जानकारी नहीं मिलती। कई लोग महीनों तक कार्रवाई का इंतजार करते रहते हैं। तत्काल तकनीकी जांच, नियमित मॉनिटरिंग और बैंकों के साथ बेहतर समन्वय से ऐसे मामलों में रिकवरी और गिरफ्तारी दोनों की संभावना बढ़ाई जा सकती है।
तकनीकी संसाधन बढ़ेंगे तो मिलेगी सफलता
साइबर अपराधों की जांच पूरी तरह तकनीक आधारित होती है। इसमें डिजिटल साक्ष्य, मोबाइल डेटा, आईपी एड्रेस, बैंकिंग ट्रांजैक्शन और विभिन्न राज्यों में सक्रिय गिरोहों की जानकारी जुटानी पड़ती है। इसके लिए आधुनिक डिजिटल फॉरेंसिक टूल, प्रशिक्षित तकनीकी विशेषज्ञ और लगातार अपडेट होने वाली जांच प्रणाली की जरूरत होती है। साइबर थाने में अब अपराध दर्ज ही नहीं हो रहे हैं। वहीं, रेंज के अलग–अलग थानों दर्ज मामलों के अलावा साइबर पोर्टल पर दर्ज मामलों पर भी तकनीकि रूप से कार्रवाई नहीं हो पा रही है। साथ ही बैंकों, टेलीकॉम कंपनियों और दूसरी राज्यों की एजेंसियों के साथ मजबूत समन्वय स्थापित करने से साइबर अपराधियों तक तेजी से पहुंचना संभव होगा। इससे ठगी की रकम की रिकवरी बढ़ेगी और लोगों का भरोसा भी साइबर पुलिस पर मजबूत होगा।

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