बेख़ौफ़ रेत माफिया ने तोड़ी प्रशासन की सील, सीतरम नदी में अवैध खनन जारी, माओवादी आउट माफिया इन

कांकेर। जिले में नदियों का सीना चीरकर रेत खनन जारी है। अवैध रेत उत्खनन करने वाले माफियाओं के हौसले बुलंद हैं। कोयलीबेड़ा ब्लॉक में कभी नक्सल प्रभावित क्षेत्र रहा सितरम इन दिनों रेत माफिया का गढ़ बना हुआ है। नारायणपुर जिले में यह रेत तस्करी की जा रही है। जगह जगह सुरक्षा बलों के कैंप होने के बाद भी नदी में अवैध खुदाई जारी है। रेत माफिया ने कांकेर जिला प्रशासन की सील तोड़ दी है। खनिज विभाग ने कार्रवाई करते हुए वाहनों को सील कर दिया था लेकिन छोटेड़ोंगर निवासी खनिज माफिया राकेश डे और उसके साथियों ने खनिज विभाग की सील तोड़कर अवैध खनन करने वाली मशीनों और हाइवा को छुड़ा लिया। इधर खनिज विभाग भी डर के मारे छोटे मोटे ट्रैक्टर को जब्त कर अपना काम निपटा रही है।
शहीद गेंदसिंह की भूमि
ये वही सीतरम गांव है जहाँ परलकोट के जमींदार और आदिवासी नेता शहीद गेंदसिंह ने जल जंगल जमीन बचाने के लिए अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी थी। सदाबहार नदियों में गिना जाने वाला कोटरी नदी अब माफिया के आतंक से किसी बरसाती नाले जैसा हो गया है। लगातार अवैध खनन के कारण नदी का पानी सूख रहा है जिसके चलते ग्रामीणों को पीने का साफ़ पानी मिलना मुश्किल हो रहा है।
नदियों में रेत के अवैध उत्खनन के चलते स्पंज की तरह काम करने वाला रेत गायब हो रहा है जिससे नदी के सूखने का खतरा बढ़ गया है। कांकेर और नारायणपुर जिले का सीमावर्ती क्षेत्र होने के बावजूद दोनों ही जिले के आला अधिकारियों के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही।
खनिज अधिकारी की साँठगांठ के बिना नदियों का दोहन असंभव?
कांकेर और नारायणपुर जिले में नदियों का जलस्तर लगातार कम हो रहा है। पहले बारहों महीने यहाँ पानी की आवक होती थी अब रेत माफिया बड़ी मशीनों से खुदाई कर एनजीटी के नियमों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। कथित विकास के नाम पर आदिवासियों के इलाके में शासन प्रशासन की मिलीभगत से रेत माफियाओं के हौसले बुलंद हैं।
माओवादी भागे, माफिया आए!
वन मंत्री केदार कश्यप और भाजपा की विष्णुदेव साय सरकार ऐसे रेत माफियाओं से निपटने का साहस नहीं जुटा पा रही। जबकि ग्रामीणों में माओवादियों के सरेंडर करने के बाद भी ऐसी घटनाएँ होने से डर का माहौल है। सबसे हैरानी की बात यह है कि इस रास्ते में माओवादियों से निपटने के लिए सुरक्षा बलों के कैंप अब भी मौजूद हैं लेकिन ये लोग भी रेत माफियाओं के सामने लाचार हैं।
माओवादियों को होगा फायदा?
जरूरत इस बात की है कि जिला प्रशासन खनिज संपदा को बचाने के लिए आगे आए। कहीं ऐसा ना हो कि इस इलाके में सक्रिय कथित माओवादी इस का लाभ उठाकर किसी कांड को अंजाम ना दे दें। यदि ऐसा हुआ तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस दावे की पोल खुल जाएगी जिसमें उन्होंने कहा था कि माओवादियों के पुनर्वास से आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा होगी और जल जंगल जमीन सुरक्षित होगा।

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