छत्तीसगढ़देश - विदेशराज्य एवं शहररायपुरसक्ति

मुनाफे के लिए मौत: छत्तीसगढ़ के उद्योगों में हादसों का सिलसिला और सवालों के घेरे में सिस्टम

छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में स्थित वेदांता पावर प्लांट में हुआ ताजा बॉयलर ब्लास्ट कोई साधारण हादसा नहीं, बल्कि वर्षों से चली रही लापरवाही, लालच और प्रशासनिक विफलता का खौफनाक परिणाम है। 17 मजदूरों की मौत और 30 से अधिक के झुलसने की घटना सिर्फ आंकड़ा नहींयह उस व्यवस्था का आईना है, जहां मजदूरों की जान सस्ती और मुनाफा सर्वोपरि है।

अब सवाल और तीखा हो गया हैक्या यह हादसा है, या वास्तव मेंसंगठित हत्या”? जब प्लांट में एंबुलेंस तक नहीं थी, मशीनों की समय पर मरम्मत नहीं हुई और क्षमता से अधिक उत्पादन लिया गया, तो यह साफ है कि यह दुर्घटना नहीं, बल्कि लापरवाही की पराकाष्ठा है।

WhatsApp Channel Join Now
Telegram Channel Join Now

यह कोई पहली घटना नहीं है। 2009 से अब तक छत्तीसगढ़ औद्योगिक हादसों की एक लंबी और शर्मनाक श्रृंखला का गवाह रहा है। भिलाई स्टील प्लांट में 2018 के गैस पाइपलाइन हादसे में कम से कम 6 मजदूरों की मौत हुई। कोरबा के BALCO प्लांट में चिमनी निर्माण के दौरान हुए भीषण हादसे में 40 से अधिक मजदूरों की जान चली गईयह देश के सबसे भयावह औद्योगिक हादसों में से एक था।

चांपा स्थित Prakash Industries Limited (PIL) प्लांट में बारबार हुए हादसे और रायपुर के सिलतरा औद्योगिक क्षेत्र में लगातार दुर्घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि खतरा किसी एक इकाई तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे औद्योगिक ढांचे में गहराई तक समाया हुआ है। हर जगह एक ही कहानी दोहराई जाती हैखराब मशीनें, अधूरी सुरक्षा और बेपरवाह प्रबंधन।

राज्य सरकार की भूमिका यहां गंभीर सवालों के घेरे में है। श्रम विभाग और फैक्ट्री निरीक्षण तंत्र क्या सिर्फ कागजों में सक्रिय हैं? अगर निरीक्षण वास्तव में होते हैं, तो इतनी बड़ी चूक बारबार कैसे होती है? या फिर यह मान लिया जाए कि पूरा सिस्टम भ्रष्टाचार और लापरवाही के बोझ तले दब चुका है?

केंद्र सरकार भी इससे अछूती नहीं है। Occupational Safety, Health and Working Conditions Code, 2020 जैसे कानून तभी सार्थक हैं जब उनका सख्ती से पालन हो। लेकिन हकीकत यह है कि कानून मौजूद हैं, पर उनका असर मजदूरों की सुरक्षा तक नहीं पहुंचता।

  छत्तीसगढ़ वीरो की भूमि : सुभाष परते

उद्योगपतियोंखासकर बड़ी कंपनियोंकी जिम्मेदारी सबसे अधिक है। लेकिन यहां सुरक्षा को खर्च समझा जाता है, निवेश नहीं। मशीनों की मरम्मत टालना, सुरक्षा उपकरणों में कटौती करना और ठेका मजदूरों को जोखिम भरे कामों में झोंकना आम बात बन चुकी है। मुनाफे की अंधी दौड़ में इंसानी जान की कीमत लगातार गिरती जा रही है।

और फिर हादसे के बाद वही घिसापिटा क्रममुआवजा। 2 लाख, 5 लाख, 35 लाखक्या यही एक इंसान की कीमत है? मुआवजा न्याय नहीं, बल्कि एक अस्थायी मरहम है, जो सिस्टम की गहरी बीमारी को ढकने की कोशिश करता है।

सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि मरने वाले ज्यादातर मजदूर दूसरे राज्यों से आए थेबेहतर जिंदगी की तलाश में। लेकिन उन्हें मिला असुरक्षित काम और अंततः मौत। क्या यही विकास का मॉडल है?

अब वक्त गया है कि सिर्फ बयान नहीं, निर्णायक कार्रवाई हो:

  • हर उद्योग का अनिवार्य और स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट
  • हर हादसे पर सीधे आपराधिक मामला दर्ज
  • पारदर्शी और जवाबदेह निरीक्षण तंत्र
  • ठेका मजदूरों के लिए ठोस सुरक्षा और अधिकार
  • और सबसे अहम—मजदूर की जान को मुनाफे से ऊपर रखना

अगर अब भी सरकार और उद्योगपति नहीं चेते, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि एक सुनियोजित अपराध माना जाएगा।

छत्तीसगढ़ के उद्योगों में बहता यह खून विकास नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता की कहानी कह रहा है।

अब फैसला करना होगा—मुनाफा बचेगा या मजदूर?

Was this article helpful?
YesNo

Live Cricket Info

Kanha Tiwari

छत्तीसगढ़ के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्होंने पिछले 10 वर्षों से लोक जन-आवाज को सशक्त बनाते हुए पत्रकारिता की अगुआई की है।

Related Articles

Back to top button