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CG News:- 1877 फर्जी नाम, 276 क्विंटल चावल का घोटाला… फिर भी वापस मिल गई राशन दुकान! आखिर किसका है संरक्षण? कौन है जिम्मेदार? सरकारी चावल कहां खप रहा है और कौन है पूरे खेल का मास्टरमाइंड?

CG News:- बिलासपुर। गरीबों के लिए सरकार हर साल करोड़ों रुपये खर्च करती है ताकि किसी का चूल्हा खाली न रहे। लेकिन अगर वही राशन बीच रास्ते में गायब होने लगे, फर्जी नामों के सहारे सरकारी अनाज का खेल चलता रहे और कार्रवाई के बाद भी वही चेहरे फिर सिस्टम में लौट आएं, तो सवाल केवल भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की विश्वसनीयता का बन जाता है।

बिलासपुर में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) से जुड़ा एक मामला इन दिनों ठीक ऐसे ही सवाल खड़े कर रहा है। जिस परिवार पर 1877 फर्जी हितग्राहियों के नाम जोड़ने, 276 क्विंटल सरकारी चावल की गड़बड़ी करने और राशन वितरण में गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगे, उसी परिवार से जुड़े लोगों को कुछ समय बाद फिर से राशन दुकान का संचालन मिल गया। अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर ऐसा कैसे हुआ? किसके संरक्षण में हुआ? और यदि कार्रवाई के बाद भी व्यवस्था नहीं बदली, तो फिर नियम-कानून का डर किसके लिए है?

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31 दिसंबर 2025… जब विभाग ने की थी बड़ी कार्रवाई

मामला जय गणेश प्राथमिक उपभोक्ता भंडार और आजाद महिला स्व-सहायता समूह की उचित मूल्य दुकानों से जुड़ा है। खाद्य विभाग ने 31 दिसंबर 2025 को दोनों दुकानों का संचालन गंभीर अनियमितताओं के आधार पर निरस्त कर दिया था।

विभागीय जांच में दावा किया गया कि 1877 फर्जी हितग्राहियों के नाम जोड़े गए थे और 276 क्विंटल सरकारी चावल की गड़बड़ी सामने आई थी। इस पूरे मामले में एक ही परिवार के कई सदस्यों के नाम जांच में आए। फर्जी नाम जोड़ने के आरोप में सद्दाम जेल भी गया था।

ऐसा लग रहा था कि विभाग ने बड़ी कार्रवाई कर स्पष्ट संदेश दिया है कि सरकारी राशन में गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ सख्ती होगी। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

कोर्ट से राहतऔर फिर शुरू हो गई दुकान

दुकान निरस्त होने के बाद दोनों पक्ष एडीएम कोर्ट पहुंचे। अपील पर सुनवाई के बाद दोनों राशन दुकानों का संचालन फिर से शुरू करने की अनुमति मिल गई।

यहीं से कई गंभीर सवाल खड़े हो गए।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस मामले में शासन को हुए नुकसान की भरपाई के लिए आरआरसी (राजस्व वसूली) की कार्रवाई जरूरी मानी जाती है, वह पूरी हुए बिना दुकान दोबारा कैसे शुरू हो गई?

जानकारी के अनुसार अब तक पूरी राशि जमा नहीं हुई है। इतना ही नहीं, तहसील से मिली जानकारी के मुताबिक वसूली की कार्रवाई शुरू कराने के लिए खाद्य विभाग की ओर से आवश्यक पत्र तक नहीं भेजा गया। यानी जिस विभाग को सरकारी नुकसान की भरपाई सुनिश्चित करनी थी, उसी ने प्रक्रिया आगे बढ़ाने में सक्रियता नहीं दिखाई।

फिर उसी विवादित व्यक्ति को जिम्मेदारी क्यों?

एक और सवाल लगातार उठ रहा है।जय गणेश प्राथमिक उपभोक्ता भंडार के अध्यक्ष एवं कांग्रेस नेता सीताराम जायसवाल ने फिर से उसी फिरोज को दुकान संचालन की जिम्मेदारी क्यों दी, जिसका नाम पहले भी विवादों में रहा है? उधर आजाद महिला स्वसहायता समूह में भी संचालन की जिम्मेदारी फिर उसी परिवार तक पहुंच गई, जिसके खिलाफ पहले कार्रवाई हुई थी।

यदि जांच में गंभीर अनियमितताएं सामने आई थीं, तो जिम्मेदारी तय होने से पहले वही लोग दोबारा व्यवस्था का हिस्सा कैसे बन गए? यही सवाल अब लोगों के बीच चर्चा का विषय है।

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क्या छुट्टी के दिन भी चली फाइलें?

मामले में यह आरोप भी सामने आ रहे हैं कि राशन दुकान का प्रभार दिलाने के लिए विभागीय अधिकारी छुट्टी के दिन भी सक्रिय रहे।

यदि यह आरोप सही हैं तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर ऐसी कौन-सी प्रशासनिक मजबूरी थी कि अवकाश के दिन भी पूरी प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ी?

क्या फिर शुरू हो गया पुराना खेल?

स्थानीय लोगों का दावा है कि दुकान दोबारा शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद फिर से सरकारी चावल के बदले नकद लेने और राशन की कथित हेराफेरी का सिलसिला शुरू हो गया।

सरकारी चावल आखिर जाता कहां है?

यहीं से कहानी और गंभीर हो जाती है।

नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर एक राशन दुकानदार ने दावा किया कि वेयरहाउस से निकलने वाला सरकारी चावल कई बार सीधे उचित मूल्य दुकानों तक नहीं पहुंचता। आरोप है कि परिवहन के नाम पर चावल पहले कुछ तय गोदामों में उतारा जाता है। वहां सरकारी बोरियां बदलकर दूसरी बोरियों में चावल भरा जाता है और बाद में अलग-अलग राइस मिलों तथा खुले बाजार में खपा दिया जाता है।

सूत्र का दावा है कि पूरे परिवहन की निगरानी जीपीएस के माध्यम से दिखाई तो जाती है, लेकिन कथित तौर पर उसी व्यवस्था का दुरुपयोग कर इस नेटवर्क को संचालित किया जाता है।

उसका यह भी दावा है कि शहर के बीच स्थित एक गोदाम से सुबह से लेकर शाम तक ऑटो और पिकअप वाहनों के जरिए सरकारी चावल की आवाजाही होती रहती है।

सबसे गंभीर दावा यह है कि शहर के लगभग 60 प्रतिशत सरकारी चावल को वर्षों से एक चर्चित व्यक्ति के नेटवर्क द्वारा कथित रूप से खपाया जा रहा है और उसे राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त है।

हालांकि इन सभी आरोपों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आना शेष है।

अब जवाब कौन देगा?

क्या 1877 फर्जी नाम जोड़ने वाले पूरे नेटवर्क की जिम्मेदारी तय हुई?

क्या 276 क्विंटल चावल की पूरी वसूली हो गई?

यदि नहीं हुई तो दुकान फिर कैसे बहाल हुई?

खाद्य विभाग ने आरआरसी की प्रक्रिया शुरू करने के लिए आवश्यक पत्राचार क्यों नहीं किया?

क्या पूरे मामले की जवाबदेही केवल कागजों तक सीमित रह जाएगी?

और यदि सरकारी चावल की कालाबाजारी के आरोप सही हैं, तो आखिर उसका असली मास्टरमाइंड कौन है?

अब प्रशासन की परीक्षा

गरीबों के हिस्से का राशन किसी भी कीमत पर बाजार में नहीं पहुंचना चाहिए। यही सरकार की मंशा है और यही कानून का उद्देश्य भी।

अब यह प्रशासन और खाद्य विभाग के सामने सबसे बड़ी परीक्षा है कि वेयरहाउस से राशन दुकानों तक हर बोरी की पारदर्शी निगरानी सुनिश्चित की जाए, वसूली की कार्रवाई पूरी की जाए, शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो और यदि किसी स्तर पर सरकारी राशन की कालाबाजारी या अनियमितता साबित होती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ बिना किसी दबाव या भेदभाव के कार्रवाई की जाए।

क्योंकि आखिरकार सवाल सिर्फ 276 क्विंटल चावल का नहीं है… सवाल उन हजारों गरीब परिवारों का है, जिनके लिए सरकारी राशन किसी योजना का हिस्सा नहीं, बल्कि दो वक्त की रोटी का सहारा है।

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Kanha Tiwari

छत्तीसगढ़ के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्होंने पिछले 10 वर्षों से लोक जन-आवाज को सशक्त बनाते हुए पत्रकारिता की अगुआई की है।

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