CG News:- रॉब, ख़ौफ़ और खामोशी — पुलिस रेंज में उठती फुसफुसाहट, मूड सिस्टम और डर की परछाइयाँ,चेला बोला— “गुरु जी, सीधी और कड़ी बात में समझा दीजिए…

CG News:- यह संवाद चाय टपरी के गुरु–चेला रूपक के जरिए यह संदेश देता है कि सत्ता या कुर्सी का प्रभाव स्थायी नहीं होता। समय के साथ पद और अधिकार समाप्त हो जाते हैं, लेकिन व्यक्ति का व्यवहार और उसका असर लोगों की यादों में लंबे समय तक बना रहता है। कहानी का मूल भाव यही है कि असली पहचान पद से नहीं, आचरण और व्यवहार से तय होती है।
रायपुर।चाय की टपरी पर शाम का माहौल सामान्य नहीं था। धुआं भी था और फुसफुसाहटें भी। सामने अखबार खुला पड़ा था और उसी पर एक खबर जैसे बार–बार नजरें रोक रही थी।
“गुरु जी” ने चाय की सिप ली और धीमी आवाज में बोले—“देखो बेटा, बात किसी एक घटना की नहीं है… छत्तीसगढ़ पुलिस की पांच रेंज—रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, सरगुजा और बस्तर—में से एक रेंज इन दिनों भीतर ही भीतर बेचैन है। वहां पदस्थ एक वरिष्ठतम अधिकारी की कार्यशैली को लेकर कई मातहत अधिकारी लंबे समय से असहज हैं… और ये असहजता अब दफ्तरों की फुसफुसाहट बन चुकी है।”
चेला चुप रहा…
फिर उसने चाय का गिलास टेबल पर रखा और चेला बोला—
“गुरु जी, लोग कहते हैं कि वहां दफ्तर का माहौल ‘मूड’ पर चलता है… कभी सामान्य, कभी अचानक सख्त। और छोटी-छोटी गलतियों पर फटकार और दबाव आम बात है।”
गुरु ने नजरें उठाईं…
और धीमी आवाज में बोले—
“और उसी माहौल में एक वाक्य बार-बार गूंजता है
‘तुम्हारी ज़िंदगी बर्बाद कर दूंगा… नौकरी भी जाएगी और तुम भी जाओगे।’
अब यह शब्द हैं या डर का स्वरूप… यह तो दफ्तर ही जानता है।”
चेला ने धीरे से पूछा—
“गुरु जी, ये भी कहा जा रहा है कि जहां–जहां इनकी पोस्टिंग रही, वहां विवादों की चर्चा पहले से रही है?”
गुरु ने चाय की आख़िरी सिप ली… और बोले—
“देखो बेटा, दफ्तर की गलियारों में ये बात जरूर घूमती है कि पिछली पदस्थापना के दौरान भी कार्यशैली को लेकर सवाल उठते रहे। पर बात वहीं रुक जाती है… क्योंकि कोई सामने बोलता नहीं।”
चेला थोड़ा गंभीर हुआ—
चेला बोला
“और गुरु जी, एक अधिकारी का कहना है कि पेंडेंसी खत्म करने पर पहले दंड मिला, फिर जब उन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया तो न सराहना मिली, न पुरस्कार… और कुछ लोगों को ‘पसंदीदा’ बताकर आगे बढ़ाया गया?”
गुरु ने शांत स्वर में कहा—
“हां बेटा… यही दूसरा पक्ष है जो सामने आता है। और इसी के बीच विभाग के भीतर निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल धीरे-धीरे जगह बना लेते हैं।”
कुछ देर दोनों चुप रहे…
सिर्फ चाय की भाप हवा में उठती रही।
चेला ने आख़िरी सवाल किया
गुरु जी… असली बात क्या है?”
गुरु ने खाली कप रखा…
और बहुत धीमे स्वर में बोले—“असली बात ये है बेटा…कि दफ्तरों में सब चलता रहता है…लेकिन डर, हमेशा चुप नहीं रहता… वो बस समय लेकर बोलता है।”
फिर उन्होंने टपरी की तरफ देखते हुए “बेटा, कुर्सी का रौब कुछ दिन का होता है, लेकिन व्यवहार की चर्चा रिटायरमेंट के बाद भी चलती है। अफसर की असली पहचान उसकी वर्दी नहीं, उसके मातहतों की जुबान बताती है।”
और बेटा एक बात समझ लेना… तलवार और डंडे का रौब भी हमेशा नहीं चलता। बड़े–बड़े लोग तलवार और डंडा लेकर आए और चले गए… आज उनका नाम तक नहीं है। इतिहास में वही लोग याद रहते हैं जो गलत पर खुद को सुधारते हैं, सही को स्वीकार करते हैं, जरूरत पड़े तो समझाते हैं, और अच्छे काम पर शाबाशी देना जानते हैं। बाकी अच्छे और बुरे का हिसाब… वक्त नहीं, ऊपर वाला रखता है।

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