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CM Visit Bilaspur: भाजपा की यह कैसी संस्कृति,चाय से ज़्यादा केटली गर्म, SP भी नहीं रोकते…”—अंदर जाने से रोका तो भड़की भाजपा नेत्री सर्किट हाउस में पुलिस से तीखी बहस, तुम लोगों को प्रोटोकॉल नहीं पता?

CM Visit Bilaspur बिलासपुर में CM के सर्किट हाउस प्रवास के दौरान भाजपा नेत्री गौरी गुप्ता को पुलिस ने सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत रोका, जिस पर उन्होंने नाराज होकर पुलिसकर्मियों से तीखी बहस की। “प्रोटोकॉल नहीं पता” जैसे तीखे बयान देते हुए उन्होंने एसपी से बात कराने की मांग की। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है और इससे ‘प्रोटोकॉल बनाम पहचान’ की बहस फिर से चर्चा में आ गई है।

बिलासपुर। मुख्यमंत्री सर्किट हाउस में ठहरे हैं। बाहर पुलिस खड़ी हैअपने कर्तव्य के साथ, अपने आदेश के साथ। और तभी वहां पहुंचती हैं भाजपा नेत्री गौरी गुप्ता। उन्हें रोका जाता है। यहीं से कहानी बदल जाती हैएक सामान्य सुरक्षा व्यवस्था, अचानकसत्ता बनाम सिस्टमकी बहस में बदल जाती है।

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कहा जाता है कि लोकतंत्र में नियम सबके लिए बराबर होते हैं। लेकिन यहां सवाल उठता हैक्या वाकई?

प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं, रोकते ही स्वर ऊंचा हो गया। शब्द बदल गए। और फिर वही वाक्य, जो अक्सर सत्ता के गलियारों में गूंजता है

तुम लोगों को प्रोटोकॉल नहीं पता है क्या? मुझे पहचानते नहीं हो क्या? तुम्हारे एसपी भी मुझे नहीं रोकतेएसपी से बात करवाओ। जितना तुम लोग अति करते हो, उतना कहीं नहीं होता।

यह सिर्फ गुस्सा नहीं था। यह उस सोच की झलक थी, जिसमें ‘पहचान’ नियम से बड़ी हो जाती है।

  रिस्दा गांव मे श्री मद भागवत पुराण के साथ महाशिवरात्रि पर किया गया रुद्राभिषेक,

कुछ देर के लिए सर्किट हाउस परिसर में माहौल गर्म हो गया। पुलिस चुप रहीशायद इसलिए क्योंकि उसकी वर्दी में जवाब देने की आज़ादी कम होती है। बाद में एक भाजपा कार्यकर्ता ने बीचबचाव किया, और मामला वहीं थम गया।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

बताया जा रहा है कि इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। लोग देख रहे हैं, सुन रहे हैंऔर अपनेअपने तरीके से समझ भी रहे हैं किप्रोटोकॉलआखिर होता क्या है।

यह पहली घटना नहीं है

सूत्र बताते हैं कि गौरी गुप्ता का यह पहला विवाद नहीं है। कुछ महीने पहले भी थाना सिविल लाइन में आधी रात को पहुंचकर कथित रूप से दबाव बनाने और हंगामा करने की घटना सामने आई थी।

सवाल सिस्टम से भी है, सत्ता से भी

यह खबर सिर्फ एक हंगामे की नहीं है। यह उस व्यवस्था की भी है, जहां नियम लागू करने वाला अक्सर कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है, और नियम तोड़ने वालापहचानका हवाला देता है।

राजनीतिक दलों के भीतर भी सवाल उठ रहे हैंक्या पद अब संघर्ष से मिलते हैं या समीकरण से?
जो कार्यकर्ता सालों तक झंडा उठाते हैं, क्या वे सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाएंगे?

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Kanha Tiwari

छत्तीसगढ़ के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्होंने पिछले 10 वर्षों से लोक जन-आवाज को सशक्त बनाते हुए पत्रकारिता की अगुआई की है।

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