CG News: एयर एंबुलेंस 24 घंटे एयरपोर्ट पर इंतजार करती रही… सवाल यह है कि मरीज के साथ अस्पताल की जिम्मेदारी कहां खत्म होती है?

CG News: इलाज के नाम पर बड़े-बड़े दावे करने वाले बिलासपुर के अपोलो अस्पताल की कार्यप्रणाली अब सवालों के घेरे में है। आरोप है कि अस्पताल ने गंभीर मरीज को हैदराबाद रेफर तो कर दिया, लेकिन एयर एंबुलेंस तक सुरक्षित पहुंचाने की सबसे अहम जिम्मेदारी से हाथ खींच लिया। न अस्पताल की एंबुलेंस मिली, न विशेषज्ञ डॉक्टर साथ भेजा गया और न ही जरूरी लाइफ सपोर्ट सिस्टम की समुचित व्यवस्था की गई। नतीजा यह हुआ कि एयरपोर्ट पहुंचते-पहुंचते मरीज की हालत इतनी बिगड़ गई कि हैदराबाद से आई एयर एंबुलेंस की मेडिकल टीम ने उसे तत्काल ले जाने से इनकार कर दिया। करोड़ों की सुविधाओं का दावा करने वाले अस्पताल की इस कथित लापरवाही के बीच एयर एंबुलेंस को पूरे 24 घंटे बिलासपुर एयरपोर्ट पर इंतजार करना पड़ा।
बिलासपुर। एक गंभीर मरीज की जिंदगी से जुड़ा यह मामला निजी अस्पतालों की जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। परिजनों का आरोप है कि अपोलो अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही ने मरीज की जान को खतरे में डाल दिया। जिस मरीज को बेहतर इलाज के लिए हैदराबाद भेजने की सलाह दी गई, उसी मरीज को एयरपोर्ट तक सुरक्षित पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाने में अस्पताल कथित तौर पर पूरी तरह विफल रहा। मजबूरी में परिजनों को निजी इंतजाम करने पड़े और लाखों रुपये का अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी उठाना पड़ा।
कोलकाता से लौटने के बाद बिगड़ी तबीयत, फिर अस्पताल में भर्ती
लोक निर्माण विभाग में पदस्थ 54 वर्षीय राजकुमार अग्रवाल कुछ दिन पहले अपने मित्रों के साथ कोलकाता गए थे। वहां तबीयत बिगड़ने के बाद वे बिलासपुर लौटे और चिकित्सकीय सलाह पर उन्हें अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया। जांच में दोनों फेफड़ों में गंभीर निमोनिया (बाइलेटरल निमोनिया), एच1एन1 संक्रमण, श्वसन विफलता और उच्च रक्तचाप की पुष्टि हुई। हालत गंभीर देखते हुए डॉक्टरों ने उन्हें हैदराबाद के यशोदा अस्पताल रेफर करने की सलाह दी। परिजनों ने करीब 13 लाख रुपये खर्च कर एयर एंबुलेंस बुक कराई, जो बुधवार शाम चकरभाठा एयरपोर्ट पहुंच गई।
रेफर किया… लेकिन रास्ते की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का आरोप
परिजनों का आरोप है कि जब अस्पताल से एयरपोर्ट तक मरीज को ले जाने के लिए एंबुलेंस मांगी गई तो अपोलो प्रबंधन ने अपनी एंबुलेंस देने से इनकार कर दिया। अस्पताल की ओर से केवल एक निजी एंबुलेंस चालक का नंबर दे दिया गया। इतना ही नहीं, गंभीर मरीज के साथ अस्पताल का कोई विशेषज्ञ डॉक्टर या प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ भी नहीं भेजा गया। परिजनों का कहना है कि अस्पताल ने यह तक सुनिश्चित नहीं किया कि मरीज को ले जाने वाली व्यवस्था उसकी गंभीर स्थिति के अनुरूप है या नहीं।
एयरपोर्ट पहुंचते-पहुंचते ऑक्सीजन 20 प्रतिशत तक गिरा, एयरलिफ्ट टला
परिजनों के मुताबिक रास्ते में मरीज की हालत लगातार बिगड़ती गई। चकरभाठा एयरपोर्ट पहुंचने तक ऑक्सीजन स्तर घटकर करीब 20 से 22 प्रतिशत रह गया। मरीज की गंभीर स्थिति देखकर हैदराबाद से आई एयर एंबुलेंस की मेडिकल टीम ने उसी समय एयरलिफ्ट करने से इनकार कर दिया। मरीज को तत्काल वापस अस्पताल लाना पड़ा, जबकि एयर एंबुलेंस पूरे 24 घंटे बिलासपुर में ही खड़ी रही। इस पूरी प्रक्रिया में परिजनों को अतिरिक्त आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा।
हैदराबाद से डॉक्टर आए, तब जाकर हो सका एयरलिफ्ट
अगले दिन यशोदा अस्पताल से तीन विशेषज्ञ डॉक्टर बिलासपुर पहुंचे। उन्होंने पहले मरीज की स्थिति को स्थिर किया। इसके बाद मरीज को ले जाने वाली एंबुलेंस और सभी लाइफ सपोर्ट सिस्टम की बारीकी से जांच की गई। व्यवस्था संतोषजनक मिलने के बाद ही मरीज को दोबारा एयरपोर्ट ले जाया गया और एयर एंबुलेंस से हैदराबाद रवाना किया गया।
ट्रैफिक पुलिस बनी सहारा, ग्रीन कॉरिडोर से बचाया कीमती समय
जहां अस्पताल पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं बिलासपुर ट्रैफिक पुलिस ने संवेदनशीलता का परिचय दिया। एसएसपी रजनेश सिंह के निर्देश और एएसपी ट्रैफिक रामगोपाल करियारे की निगरानी में ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया। कंट्रोल रूम से ट्रैफिक सिग्नल नियंत्रित किए गए और पूरे मार्ग पर पुलिस बल तैनात रहा, ताकि एंबुलेंस बिना किसी बाधा के एयरपोर्ट तक पहुंच सके।
अब सबसे बड़ा सवाल…
जब अस्पताल स्वयं मरीज को हायर सेंटर रेफर करता है, तो क्या उसे सुरक्षित तरीके से एयर एंबुलेंस तक पहुंचाना उसकी जिम्मेदारी नहीं बनती? यदि रास्ते में ही मरीज की हालत बिगड़ जाए तो इसकी जवाबदेही किसकी होगी? यही सवाल अब मरीज के परिजन उठा रहे हैं।

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