CG News :पीएम श्री कन्या विद्यालय में खराब साइकिल वितरण, अध्यक्ष राकेश जालान ने कहा – “यह छात्राओं के साथ धोखा”


- पेंड्रा: सरकारी साइकिल योजना फेल? छात्राओं को मिली टूटी-फूटी साइकिलें, गुणवत्ता जांच पर उठे सवाल
GPM -09 अगस्त 2026: राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी “निःशुल्क साइकिल वितरण योजना” का उद्देश्य छात्राओं को स्कूल आने-जाने में सुविधा और आत्मनिर्भर बनाना है। लेकिन जिला जीपीएम के पेंड्रा स्थित पीएम श्री स्वामी आत्मानंद हिंदी माध्यम कन्या विद्यालय में इस योजना की जमीनी हकीकत देखकर सवाल खड़े हो गए हैं। नौवीं कक्षा की छात्राओं को वितरित की गई कई साइकिलें खराब, टूटी-फूटी और चलने लायक नहीं मिलीं।

अध्यक्ष राकेश जालान ने किया औचक निरीक्षण, गुणवत्ता को बताया “अस्वीकार्य”
मामले की शिकायत मिलने के बाद नगर पालिका पेंड्रा के अध्यक्ष श्री राकेश जालान शुक्रवार को अचानक विद्यालय पहुंचे। उन्होंने वहां छात्राओं को मिली साइकिलों का बारीकी से निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान कई साइकिलों के फ्रेम मुड़े हुए, ब्रेक खराब, चेन उतरी हुई और टायर पंचर मिले।
साइकिलों की स्थिति देखकर अध्यक्ष ने कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि “सरकार का पैसा खर्च कर यदि छात्राओं को इस तरह की जर्जर और गुणवत्ता विहीन साइकिलें दी जाएंगी, तो यह योजना के उद्देश्य के साथ खिलवाड़ है। टूटी-फूटी साइकिल पर बच्चियों का 5-10 किलोमीटर तक स्कूल आना-जाना न केवल मुश्किल है बल्कि उनके लिए असुरक्षित भी है।”

प्रश्नों के घेरे में आई सरकारी गुणवत्ता जांच प्रक्रिया
साइकिलों में इतनी अधिक खामियां सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल शासन स्तर पर होने वाली गुणवत्ता जांच और सप्लाई प्रक्रिया पर उठ रहा है। वितरण से पहले स्कूल प्रबंधन या संबंधित विभाग द्वारा साइकिलों की जांच क्यों नहीं की गई? सप्लायर ने किस आधार पर इतनी खराब साइकिलें सप्लाई कीं? और इसकी मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी किस अधिकारी की थी?
अध्यक्ष राकेश जालान ने जिला प्रशासन से इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है। उन्होंने कहा कि “जब सरकारी खजाने से लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, तो यह सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है कि उसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक सही और गुणवत्तापूर्ण तरीके से पहुंचे।”

जनप्रतिनिधि ने उठाई जिम्मेदारी, निजी खर्च पर कराएंगे मरम्मत
छात्राओं की परेशानी को देखते हुए नगर पालिका अध्यक्ष ने प्रशासनिक प्रक्रिया का इंतजार नहीं किया। उन्होंने मौके पर ही घोषणा की कि वे अपने निजी कोष से इन सभी खराब साइकिलों की मरम्मत कराएंगे, ताकि छात्राओं की पढ़ाई बाधित न हो।
हालांकि अध्यक्ष का यह कदम सराहनीय है, लेकिन इसी के साथ यह सवाल भी गहरा गया है कि आखिर जनप्रतिनिधियों को सरकारी योजना की खामियों को अपने स्तर पर क्यों ठीक करना पड़ रहा है? क्या सरकारी तंत्र अपनी जवाबदेही से मुंह मोड़ रहा है?
क्या योजना का मकसद होगा पूरा?
साइकिल वितरण योजना का मूल उद्देश्य ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों की छात्राओं को ड्रॉपआउट से बचाना और उनकी शिक्षा को सुगम बनाना है। लेकिन जब योजना के तहत मिलने वाले संसाधन ही घटिया और अनुपयोगी हों, तो उस योजना का उद्देश्य कैसे पूरा होगा?
अब सभी की नजरें जिला प्रशासन पर हैं। देखना होगा कि प्रशासन इस मामले को सिर्फ आनन-फानन में साइकिल ठीक कराने तक सीमित रखता है, या फिर सप्लाई चेन और गुणवत्ता जांच में हुई लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और एजेंसियों पर कड़ी कार्रवाई भी करता है।









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