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CG News :-आरटीआई में उलझा पुलिस मुख्यालय: डांगी मामले में “तीसरे पक्ष” का हवाला, जवाबों में विरोधाभास ने उठाए सवाल

CG News:-आरटीआई, जिसे हम पारदर्शिता की सबसे मजबूत खिड़की मानते हैं, उसी खिड़की से अब धुंध झांकने लगी है। छत्तीसगढ़ पुलिस मुख्यालय ने एक ही तरह के मामलों में अलगअलग जवाब देकर सवाल खड़े कर दिए हैं। कहींरिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैकहा गया, तो कहीं उसी मामले मेंतीसरे पक्ष की सहमति नहीं मिलीबताकर सूचना रोक दी गई।

एक ही कानून, दो अलग नियमछत्तीसगढ़ पुलिस के जवाबों में विरोधाभास ने खड़े किए गंभीर सवाल

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Raipur News:- रायपुर। बिलासपुर निवासी अधिवक्ता अभिषेक पांडेय ने 25 मार्च 2026 को आरटीआई आवेदन देकर तत्कालीन आईजी रतनलाल डांगी के अक्टूबर 2025 के शिकायत पत्र और उसके वापस लेने से संबंधित दस्तावेज मांगे।पुलिस मुख्यालय (अपराध अनुसंधान विभाग, नवा रायपुर) ने जानकारी देने से इनकार करते हुए आरटीआई अधिनियम की धारा 11(1) का हवाला दिया और इसेतीसरे पक्षसे जुड़ा मामला बताया। विभाग के अनुसार, रतनलाल डांगी से सहमति मांगी गई थी, लेकिन उन्होंने जानकारी साझा करने से मना कर दिया। इससे पहले 19 मार्च 2026 को दिए गए एक अन्य आरटीआई जवाब में इसी विभाग ने कहा था कि संबंधित शिकायत का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। हालांकि उसी जवाब में यह भी स्वीकार किया गया था कि मामले की जांच दो सदस्यीय टीम द्वारा की गई थी। एक अन्य प्रकरण (कल्पना वर्मा मामला) में विभाग ने बिना किसी तीसरे पक्ष की सहमति के पूरी जानकारी उपलब्ध कराई थी।

Raipur रायपुर। छत्तीसगढ़ में सूचना के अधिकार (RTI) कानून के तहत पारदर्शिता की जो तस्वीर सामने आनी चाहिए थी, उसकी जगह अब सवालों का अंबार खड़ा हो गया है। पुलिस मुख्यालय का रवैया खुद उसके ही जवाबों में उलझता नजर रहा हैजहां एक मामले में बिना किसी आपत्ति के जानकारी दी जाती है, वहीं दूसरे मेंतीसरे पक्षका हवाला देकर सूचना पर ताला जड़ दिया जाता है।

मामला बिलासपुर निवासी अधिवक्ता अभिषेक पांडेय द्वारा 25 मार्च 2026 को दाखिल एक आरटीआई आवेदन से जुड़ा है। उन्होंने तत्कालीन आईजी रतनलाल डांगी द्वारा अक्टूबर 2025 में डीजीपी को भेजे गए शिकायत पत्र की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं। साथ ही उस आवेदन की कॉपी भी मांगी गई थी, जिसके जरिए बाद में शिकायत वापस ली गई थी।

लेकिन पुलिस मुख्यालय के अपराध अनुसंधान विभाग, नवा रायपुर ने इस जानकारी को देने से साफ इंकार कर दिया। इसके पीछे तर्क दिया गया कि यहतीसरे पक्षसे जुड़ा मामला है और आरटीआई अधिनियम की धारा 11(1) लागू होती है। विभाग के अनुसार, रतनलाल डांगी से सहमति मांगी गई थी, लेकिन उन्होंने जानकारी साझा करने से इनकार कर दियाऔर यहीं पर विभाग ने अपने हाथ खड़े कर दिए।

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अब सवाल सीधा है
जब रिकॉर्ड ही नहीं था, तो जांच किस आधार पर हुई?
और अगर रिकॉर्ड मौजूद नहीं था, तो अब तीसरे पक्ष से सहमति लेने की प्रक्रिया क्यों?

यह विरोधाभास सिर्फ तकनीकी गलती नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।

दोहरा मापदंड: एक केस में खुलापन, दूसरे में चुप्पी

पुलिस विभाग का यह रवैया तब और संदिग्ध हो जाता है जब इसी तरह के एक अन्य मामलेकल्पना वर्मा प्रकरणपर नजर डाली जाती है।
उस मामले में बिना किसी तीसरे पक्ष की सहमति के पूरी जानकारी आरटीआई के तहत उपलब्ध करा दी गई थी।

यानी

एक ही विभाग

एक ही कानून

लेकिन दो अलग-अलग तरीके

क्या किसी को बचाने की कोशिश?

पूरा मामला यह संकेत देता है कि कहीं कहीं तथ्यों को घुमाया जा रहा है।
निलंबित आईपीएस रतनलाल डांगी से जुड़े इस प्रकरण में पारदर्शिता की बजाय प्रक्रियात्मक बहाने सामने रखे जा रहे हैं।

यह सवाल अब सिर्फ एक आरटीआई आवेदन का नहीं रह गया है, बल्कि यह शासन की जवाबदेही, पारदर्शिता और कानून के समान अनुपालन का मुद्दा बन चुका है।

सूचना का अधिकार कानून नागरिकों को सशक्त बनाने के लिए बनाया गया था, लेकिन जब वही कानून अलग-अलग मामलों में अलग-अलग तरीके से लागू होने लगे, तो भरोसा कमजोर पड़ता है।

छत्तीसगढ़ पुलिस मुख्यालय का यह मामला अब सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सिस्टम की विश्वसनीयता की परीक्षा बन चुका है।

यहीं से शुरू होता है असली विरोधाभास

इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल पुलिस मुख्यालय के ही पहले दिए गए जवाब से खड़ा होता है।
19 मार्च 2026 को दिए गए एक अन्य आरटीआई जवाब में विभाग ने साफ कहा था कि इस शिकायत से संबंधित कोई भी रिकॉर्ड या दस्तावेज उनके पास उपलब्ध नहीं है।

लेकिन उसी जवाब में यह भी स्वीकार किया गया था कि इस मामले की जांच दो सदस्यीय टीम द्वारा की गई थी।

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Kanha Tiwari

छत्तीसगढ़ के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्होंने पिछले 10 वर्षों से लोक जन-आवाज को सशक्त बनाते हुए पत्रकारिता की अगुआई की है।

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