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CG News: हाई सिक्योरिटी जेल में आखिर क्या हो रहा है? महीनेभर में 5 बंदियों की मौत… फिर भी किसी ने जानने की कोशिश क्यों नहीं की कि जेल के भीतर क्या चल रहा है? आखिर सिस्टम अब तक बेखबर क्यों है?

CG News:- बिलासपुर। जेल की चारदीवारी के भीतर क्या हो रहा है? यह सवाल इसलिए नहीं उठ रहा कि एक बंदी की मौत हुई है। यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि एक महीने के भीतर पांच बंदियों की जान जा चुकी है। पहले हत्या, फिर बीमारी से लगातार मौतें और अब गैसीफायर प्लांट में कूदकर आत्महत्या। जिस सेंट्रल जेल को प्रदेश की हाई सिक्योरिटी जेल कहा जाता है, वहां लगातार हो रही इन घटनाओं ने सुरक्षा व्यवस्था, कैदियों की निगरानी, स्वास्थ्य सेवाओं और पूरे कारागार तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उससे भी बड़ा सवाल यह है कि हर घटना के बाद जांच की घोषणा तो होती है, लेकिन अब तक किसी स्तर पर जवाबदेही तय किए जाने की जानकारी सामने क्यों नहीं आई? आखिर जेल के भीतर ऐसा क्या हो रहा है, जिसे जानने और सुधारने की कोशिश सिस्टम करता हुआ दिखाई नहीं दे रहा?

बिलासपुर। सेंट्रल जेल बिलासपुर एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। पिछले एक महीने के भीतर पांच बंदियों की मौत के बाद अब आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदी राहुल उर्फ विकेश कंवर (46) ने गैसीफायर प्लांट में कूदकर आत्महत्या कर ली। इस सनसनीखेज घटना ने जेल की सुरक्षा व्यवस्था, कैदियों की निगरानी, स्वास्थ्य सुविधाओं और मानसिक स्वास्थ्य प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि गैसीफायर प्लांट में फंसे शव को बाहर निकालने में प्रशासन को करीब 20 घंटे तक मशक्कत करनी पड़ी।

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बुधवार शाम करीब 4:15 बजे कैदियों के लिए भोजन तैयार किया जा रहा था और गैसीफायर प्लांट चालू था। इसी दौरान जांजगीरचांपा जिले के बम्हनीडीह निवासी राहुल उर्फ विकेश कंवर अचानक प्लांट के पास पहुंचा और किसी को संभलने का मौका दिए बिना धधकती भट्ठी में कूद गया। घटना के बाद जेल परिसर में अफरातफरी मच गई। सूचना मिलते ही कलेक्टर संजय अग्रवाल और एसएसपी रजनेश सिंह मौके पर पहुंचे और अधिकारियों से पूरे घटनाक्रम की जानकारी ली।

प्लांट अत्यधिक गर्म होने के कारण बुधवार शाम शव नहीं निकाला जा सका। गुरुवार सुबह एसडीआरएफ की टीम मौके पर पहुंची, लेकिन आवश्यक उपकरण नहीं होने के कारण वह भी शव निकालने में सफल नहीं हो सकी। इसके बाद स्थानीय कबाड़ी के कर्मचारियों को बुलाया गया। उन्होंने करीब दो घंटे की मशक्कत के बाद गैसीफायर प्लांट को काटकर शव बाहर निकाला। पूरी कार्रवाई जेएमएफसी पोनिका यादव की मौजूदगी में हुई। मौके पर सिविल लाइन पुलिस, फोरेंसिक टीम और मृतक के परिजन मौजूद रहे। पंचनामा की कार्रवाई पूरी कर शव को पोस्टमार्टम के लिए सिम्स भेजा गया। पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया। मामले की न्यायिक जांच कराई जाएगी।

प्रारंभिक जानकारी के अनुसार राहुल वर्ष 2014 से दोहरे हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा काट रहा था। परिजनों ने बताया कि वह लंबे समय से पैरोल या छुट्टी मिलने की उम्मीद लगाए हुए था और बारबार आवेदन कराने की बात कहता था। परिवार के कुछ सदस्यों का सहयोग नहीं मिलने के कारण उसका आवेदन आगे नहीं बढ़ सका। बताया जा रहा है कि इसी बात से वह मानसिक रूप से परेशान और नाराज था। हालांकि आत्महत्या के वास्तविक कारणों का खुलासा न्यायिक जांच के बाद ही हो सकेगा।

एक महीने में पांच बंदियों की मौत, आखिर जेल में क्या हो रहा है?

बिलासपुर सेंट्रल जेल में पिछले एक महीने के भीतर पांच बंदियों की मौत ने जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मौतों का सिलसिला 23 जून को पॉक्सो के आरोपी नीलू जगत की जेल के भीतर हुई हत्या से शुरू हुआ। इसके बाद रायगढ़ निवासी और आजीवन कारावास की सजा काट रहे रामभरोसे माझी की तबीयत बिगड़ने के बाद मौत हो गई। जून माह में ही गतौरा निवासी राजू गोंड की भी जेल में मौत हुई, जबकि उससे पहले बंदी धर्मेंद्र सिंह ने भी जेल के भीतर दम तोड़ दिया। अब ताजा मामला राहुल उर्फ विकेश कंवर की आत्महत्या का सामने आया है। हत्या, बीमारी और आत्महत्या जैसी लगातार सामने आ रही घटनाओं ने जेल की सुरक्षा व्यवस्था, कैदियों की निगरानी, स्वास्थ्य सुविधाओं और मानसिक स्वास्थ्य प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर एक महीने के भीतर पांच-पांच मौतों के बाद भी जेल की व्यवस्था में सुधार के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं। हालांकि जेल प्रशासन का कहना है कि सभी मामलों की नियमानुसार जांच कराई जा रही है।

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पांच मौतेंफिर भी किसी की जवाबदेही क्यों तय नहीं की गई?

बिलासपुर सेंट्रल जेल में एक महीने के भीतर पांच बंदियों की मौत हो चुकी है। पहले जेल के भीतर हत्या, फिर बीमारी से मौतें और अब गैसीफायर में कूदकर आत्महत्या। इतनी गंभीर घटनाओं के बावजूद अब तक किसी अधिकारी की जवाबदेही तय किए जाने की जानकारी सामने नहीं आई है। हर घटना के बाद जांच के आदेश जरूर दिए गए, लेकिन सवाल यह है कि क्या जांच सिर्फ मौत की वजह जानने के लिए होती है या फिर जिम्मेदारी तय करने के लिए भी? अगर एक ही जेल में इतने कम समय में लगातार मौतें हो रही हैं, तो यह जानना भी जरूरी है कि आखिर चूक कहां हुई और उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। प्रदेश में जेल विभाग की कमान डीजी, एडीजी, आईजी और डीआईजी जैसे वरिष्ठ अधिकारियों के हाथ में होती है, जबकि स्थानीय स्तर पर जेल अधीक्षक और जेल प्रशासन सुरक्षा, निगरानी और बंदियों की देखरेख के लिए जिम्मेदार होते हैं। ऐसे में पांच मौतों के बाद भी यदि किसी स्तर पर जवाबदेही तय नहीं की गई है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या व्यवस्था केवल जांच रिपोर्ट का इंतजार करेगी या फिर जवाबदेही भी तय करेगी। क्या किसी ने यह जानने की कोशिश की कि आखिर जेल के भीतर ऐसा क्या हो रहा है कि मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा? जेल की चारदीवारी के भीतर होने वाली हर मौत सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं होती, बल्कि पूरे सिस्टम से जवाब मांगती है। और जब एक ही जेल में बार-बार ऐसी घटनाएं हों, तो सवाल सिर्फ स्थानीय जेल प्रशासन पर नहीं, बल्कि पूरे निगरानी तंत्र पर भी उठना स्वाभाविक है।

एसडीआरएफ नहीं निकाल सकी शव, कबाड़ी के कर्मचारियों ने संभाला मोर्चा

गैसीफायर प्लांट के भीतर फंसे शव को निकालना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया। प्लांट अत्यधिक गर्म होने के कारण रातभर इंतजार करना पड़ा। गुरुवार सुबह एसडीआरएफ की टीम मौके पर पहुंची, लेकिन आवश्यक उपकरण नहीं होने के कारण वह शव निकालने में सफल नहीं हो सकी। इसके बाद स्थानीय कबाड़ी के कर्मचारियों की मदद ली गई। उन्होंने करीब दो घंटे की मशक्कत के बाद गैसीफायर प्लांट को काटकर शव बाहर निकाला। पूरी प्रक्रिया के दौरान मजिस्ट्रेट, फोरेंसिक टीम, पुलिस और मृतक के परिजन मौके पर मौजूद रहे।

10 साल से पैरोल का इंतजार, टूट गई उम्मीद

राहुल के परिजनों के मुताबिक वह करीब 10 वर्षों से जेल में बंद था और लगातार पैरोल या छुट्टी के लिए आवेदन लगाने की बात करता था। परिवार के कुछ सदस्यों का सहयोग नहीं मिलने के कारण आवेदन आगे नहीं बढ़ पाया। इससे वह लंबे समय से मानसिक तनाव और निराशा में था। पुलिस और जेल प्रशासन इस पहलू की भी जांच कर रहे हैं। आत्महत्या की वास्तविक वजह न्यायिक जांच रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

पांच मौतों के बाद भी खामोश सिस्टम, जेल की दीवारों के पीछे आखिर चल क्या रहा है?

आखिर जेल की उन ऊंची दीवारों के पीछे ऐसा क्या हो रहा है, जिसकी भनक बाहर आने से पहले ही कई सवाल खड़े हो जाते हैं? एक महीने में पांच बंदियों की मौत के बाद भी अगर व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव नजर नहीं आता, तो चिंता होना स्वाभाविक है। क्या सिस्टम सिर्फ हर घटना के बाद जांच का इंतजार करेगा या उन कमियों को भी तलाशेगा, जिनकी वजह से ऐसी नौबत बारबार रही है? अब जरूरत सिर्फ मौतों का हिसाब रखने की नहीं, बल्कि उन सवालों के जवाब खोजने की है जो बिलासपुर सेंट्रल जेल की व्यवस्था पर लगातार उठ रहे हैं।

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Kanha Tiwari

छत्तीसगढ़ के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्होंने पिछले 10 वर्षों से लोक जन-आवाज को सशक्त बनाते हुए पत्रकारिता की अगुआई की है।

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