CG News:- शराब दुकान में स्टॉक शॉर्टेज’ या संगठित खेल? दुकान में नहीं, चखना में फुल—आखिर शराब जा कहां रही है? 80 की बोतल 250 में—सिस्टम चुप है या सब सेट है?

CG News:- कंपोजिट शराब दुकान में कुछ तो गड़बड़ है। दुकान में “स्टॉक खत्म”, लेकिन बगल की चखना दुकान में वही शराब धड़ल्ले से—आखिर कैसे?80 रुपये की बोतल 150-250 में बिक रही है, तो ये मुनाफा किसकी जेब में जा रहा है? आबकारी विभाग जानकर भी अनजान है या फिर खेल कहीं ऊपर तक सेट है? सवाल सीधा है—शॉर्टेज असली है… या फिर पूरा सिस्टम ही ‘मैनेज’ है?
Janjgir Champaजांजगीर–चांपा। ग्राम खोखरा स्थित कंपोजिट शराब दुकान पर लगे आरोप अब सिर्फ अनियमितता तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां देसी शराब की ब्लैक मार्केटिंग सुनियोजित तरीके से की जा रही है—लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह खेल किसकी नजरों से बचकर चल रहा है?
जब दुकान में ‘स्टॉक खत्म’, तो चखना दुकान में ‘भरपूर सप्लाई’ कैसे?
सूत्र बताते हैं कि ग्राहकों को शराब दुकान में “स्टॉक खत्म” कहकर लौटा दिया जाता है, जबकि ठीक बगल की लाइसेंसी चखना दुकान में वही देसी शराब खुलेआम मिल रही है।
सवाल यह है—अगर स्टॉक खत्म है, तो वही शराब चखना दुकान तक पहुंच कैसे रही है?
80 रुपये की शराब 250 में—किसके इशारे पर यह खेल?
सरकारी दर 80 रुपये प्रति क्वार्टर तय है, लेकिन आरोप है कि चखना दुकान में यही शराब 150 से 250 रुपये तक बेची जा रही है।
क्या यह महज संयोग है या फिर तय रणनीति के तहत उपभोक्ताओं से वसूली की जा रही है?
और अगर ऐसा है, तो इसका लाभ किसे मिल रहा है?
ग्राहक मजबूर क्यों, विरोध बेअसर क्यों?
इस कथित खेल का सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है। मजबूरी में लोगों को अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। कई ग्राहकों ने आरोप लगाया कि विरोध करने पर उन्हें टाल दिया जाता है या साफ मना कर दिया जाता है।
क्या उपभोक्ताओं की शिकायतों की कोई सुनवाई नहीं?
आबकारी विभाग की चुप्पी—अनदेखी या मिलीभगत?
स्थानीय लोगों का दावा है कि इस पूरे मामले की जानकारी आबकारी विभाग के निचले स्तर के आरक्षक से लेकर सहायक आयुक्त तक को है।
अगर जानकारी है, तो कार्रवाई क्यों नहीं?
और अगर जानकारी नहीं है, तो निगरानी तंत्र इतना कमजोर क्यों?
यह सवाल सीधे विभाग की पारदर्शिता और जवाबदेही पर खड़े हो रहे हैं।
‘शॉर्टेज’ का बहाना—कमी असली या बनाई गई?
पिछले कुछ दिनों से देसी शराब की कथित कमी (शॉर्टेज) बताकर इस अवैध धंधे को और बढ़ावा दिए जाने के आरोप हैं।
क्या यह शॉर्टेज वास्तविक है या फिर कृत्रिम रूप से बनाई गई स्थिति, ताकि बाहर ऊंचे दामों पर बिक्री की जा सके?
नियम साफ, फिर भी उल्लंघन क्यों?
आबकारी अधिनियम के तहत:
- तय दर से अधिक कीमत पर शराब बेचना अवैध है
- लाइसेंसी दुकान से बाहर स्टॉक ट्रांसफर करना नियमों का उल्लंघन है
- कृत्रिम कमी दिखाना गंभीर आर्थिक अनियमितता है
- जानकारी के बावजूद कार्रवाई न करना कर्तव्य में लापरवाही मानी जाती है
फिर भी अगर यह सब हो रहा है, तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
आखिर जिम्मेदार कौन?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या यह सिर्फ एक दुकान तक सीमित मामला है, या फिर पूरे सिस्टम में कहीं न कहीं खामी है?
और क्या होगी जाँच और यदि सही पाया जाता हैं , तो जवाबदेही तय कब होगी और किस पर होगी?
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