अपोलो अस्पताल में इलाज में लापरवाही की शिकायत जारी,

अपोलो प्रबंधन, चिकित्सा स्टाफ की लापरवाही ने फिर ली एक स्वस्थ ब्यक्ति की जान।
पैर दर्द का इलाज कराने गए थे,13 दिन बाद लौटी लाश…
परिजनों की स्वतंत्र जांच की मांग,
बिलासपुर,
अपोलो अस्पताल बिलासपुर में इलाज में लापरवाही की शिकायत लगातार जारी है।
आज दिन यहां नकली डा तो ग़लत इलाज कू चलते स्वस्थ मरीज़ अपनी जान गंवा चुके हैं।
अपोलो अस्पताल में इलाज में लापरवाही का एक और प्रकरण फिर सामने आया है।
अब की बार अपोलो अस्पताल में इलाज में लापरवाही का शिकार कोरबा का एक स्वस्थ ब्यक्ति हुआ है।
उदय नारायण जायसवाल, जिसके
पैर में दर्द था… परिवार इलाज के लिए अस्पताल पहुंचा था। किसी ने नहीं सोचा था कि 13 दिन बाद उसी अस्पताल से मौत की खबर आएगी। कोरबा के 81 वर्षीय उदय नारायण जायसवाल को बेहतर इलाज की उम्मीद में अपोलो अस्पताल बिलासपुर में भर्ती कराया गया, लेकिन परिजनों का दावा है कि इलाज के दौरान उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई और आखिरकार उनकी जान चली गई। लगातार अस्पताल के डाक्टरों और स्टाफ की निगरानी में रहने के बाद भी, प्रबंधन और अस्पताल के चिकित्सा स्टाफ की लापरवाही के चलते अंततः 13 दिन दिन बाद उनकी मौत हो गई।
परिजनों का दावा है कि भर्ती के समय उनकी हालत सामान्य थी, लेकिन इलाज के दौरान उन्हें आईसीयू और फिर वेंटिलेटर पर शिफ्ट किया गया। अब परिवार सवाल उठा रहा है कि आखिर इन 13 दिनों में ऐसा क्या हुआ, जिससे एक सामान्य मरीज की जान चली गई? परिजनों ने आरोप लगाते हुए कहा है कि अस्पताल के चिकित्सकों की लापरवाही, उपचार प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और परिजनों को इलाज में गुमराह करने के कारण उदय नारायण की मृत्यु हुई । परिजनों ने पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की है। इस घटना ने निजी अस्पतालों की जवाबदेही, मरीजों के अधिकार और स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अपोलो अस्पताल में इलाज के दौरान होने वाली मौतों को लेकर उठ रहे सवालों ने एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही और पारदर्शिता पर बहस छेड़ दी है। अपोलो में इलाज के लिए आए बुजुर्ग के परिजनों ने उपचार प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अपोलो अस्पताल में पैर दर्द की शिकायत लेकर भर्ती हुए 81 वर्षीय बुजुर्ग की 13 दिन बाद मौत हो गई। बुजुर्ग की मौत के बाद मरीजों के अधिकार, अस्पतालों की कार्यप्रणाली, उपचार की निगरानी व्यवस्था को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
कोरबा निवासी राजेश कुमार जायसवाल ने स्वास्थ्य विभाग को शिकायत देकर आरोप लगाया है कि उनके पिता उदय नारायण जायसवाल को 14 अप्रैल को दाहिने पैर में दर्द की शिकायत के बाद अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों के अनुसार भर्ती के समय वे पूरी तरह होश में थे और सामान्य रूप से बातचीत कर रहे थे। परिवार को उम्मीद थी कि कुछ दिनों के इलाज के बाद वे स्वस्थ होकर घर लौट आएंगे। लेकिन इलाज के दौरान उनकी स्थिति लगातार बिगड़ती गई। उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया और बाद में वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया। 27 अप्रैल को अस्पताल ने उनकी मौत की सूचना दी। परिजनों का आरोप है कि पूरे उपचार के दौरान उन्हें मरीज की वास्तविक स्थिति के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई। कई दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए गए, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि कौन-कौन सी चिकित्सकीय प्रक्रियाएं अपनाई जा रही हैं और हालत बिगड़ने के पीछे क्या कारण हैं। परिवार का कहना है कि यदि मरीज किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित था तो इसकी जानकारी उन्हें विस्तार से क्यों नहीं दी गई और यदि ऐसी कोई स्थिति नहीं थी तो फिर हालत अचानक इतनी गंभीर कैसे हो गई। शिकायत में स्वतंत्र मेडिकल विशेषज्ञों की समिति गठित कर पूरे मामले की जांच कराने और अस्पताल के रिकॉर्ड की समीक्षा करने की मांग की गई है।
आरक्षक की मौत के बाद निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर उठे थे सवाल
कुछ दिन पहले श्री राम केयर अस्पताल में उपचार के दौरान सरकंडा थाने में पदस्थ आरक्षक की मौत का मामला भी सामने आया था। परिजनों ने आरोप लगाया है कि उपचार में लापरवाही और समय पर उचित चिकित्सकीय देखभाल नहीं मिलने के कारण आरक्षक की जान गई। मामले को लेकर शिकायत दर्ज कराई गई है और निष्पक्ष जांच की मांग की जा रही है।
सरकारी योजना का गरीबों को नहीं मिल रहा फायदा
आयुष्मान भारत योजना के तहत सूचीबद्ध निजी अस्पतालों की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं। सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर गरीब और जरूरतमंद मरीजों को कैशलेस उपचार उपलब्ध करा रही है, लेकिन यदि उपचार प्रक्रिया को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती हैं तो उनकी स्वतंत्र जांच और जवाबदेही तय करना भी उतना ही आवश्यक है।
13 दिन में क्या हुआ, यही सबसे बड़ा सवाल
उदय नारायण जायसवाल को 14 अप्रैल को पैर दर्द की शिकायत के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों का दावा है कि उस समय उनकी स्थिति सामान्य थी और वे बातचीत कर रहे थे। इसके बाद उन्हें आईसीयू और फिर वेंटिलेटर पर रखा गया। 27 अप्रैल को उनकी मौत हो गई। परिवार का कहना है कि उन्हें यह नहीं बताया गया कि आखिर कौन सी चिकित्सकीय जटिलता के कारण मरीज की हालत इतनी गंभीर हो गई। अब पूरा विवाद इन्हीं 13 दिनों के उपचार, मेडिकल रिकॉर्ड और अस्पताल की ओर से दी गई जानकारी के इर्द-गिर्द केंद्रित है।
रामकेयर में आरक्षक की मौत, परिजनों ने लगाए गंभीर आरोप
श्री रामकेयर अस्पताल में उपचार के दौरान एक आरक्षक की मौत का मामला भी सुर्खियों में है। परिजनों का आरोप है कि मरीज की स्थिति बिगड़ने के बावजूद समय पर उचित उपचार और निगरानी नहीं मिली। उनका कहना है कि अस्पताल प्रबंधन ने स्थिति की गंभीरता को लेकर पर्याप्त जानकारी भी नहीं दी थी। मामले की शिकायत संबंधित विभागों में की गई है और निष्पक्ष जांच की मांग उठाई गई है। हालांकि अस्पताल प्रबंधन का विस्तृत पक्ष अभी सामने आना बाकी है। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि उपचार में किसी प्रकार की लापरवाही हुई थी या नहीं।
मरीज और परिजनों का भी है जानने का अधिकार
नियमों के मुताबिक किसी मरीज को आईसीयू या वेंटिलेटर पर शिफ्ट करना सामान्य प्रक्रिया नहीं होती। ऐसी स्थिति में मरीज की गंभीरता, उपचार की आवश्यकता और संभावित जोखिमों की जानकारी परिजनों को दी जानी चाहिए। मरीज के अधिकारों में उपचार से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त करना भी शामिल है। यदि संवाद और पारदर्शिता की कमी होती है तो विवाद और अविश्वास की स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए अस्पतालों की जवाबदेही केवल इलाज तक सीमित नहीं बल्कि सूचना साझा करने तक भी है।
आयुष्मान योजना में बढ़े निगरानी और जवाबदेही के सवाल
आयुष्मान भारत योजना के तहत निजी अस्पतालों को गरीब और जरूरतमंद मरीजों का कैशलेस उपचार उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी दी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि योजना की सफलता केवल उपचार उपलब्ध कराने से नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता और पारदर्शिता से भी तय होगी। यदि मरीजों और परिजनों की शिकायतें बढ़ती हैं तो अस्पतालों की नियमित ऑडिट, मेडिकल रिकॉर्ड की समीक्षा और स्वतंत्र जांच व्यवस्था को और मजबूत करना जरूरी हो जाता है। स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि शिकायतों के त्वरित और निष्पक्ष निराकरण से ही लोगों का भरोसा कायम रखा जा सकता है।
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