Bilaspur Crime: पहले छात्रा, अब युवती… आखिर सिरगिट्टी थाने में चल क्या रहा है? FIR के लिए संघर्ष ने थाना प्रभारी की कार्यशैली पर खड़े किए गंभीर सवाल

Bilaspur Crime:-प्रदेश में इन दिनों सुशासन तिहार चल रहा है। सरकारी विज्ञापनों में व्यवस्था जनता के दरवाजे तक पहुंचती दिखाई देती है। लेकिन बिलासपुर के सिरगिट्टी थाने से आई दो खबरें कुछ और कहानी कह रही हैं।दुष्कर्म पीड़िता छात्रा हो या मारपीट की शिकार युवती, दोनों मामलों में आरोप है कि तत्काल कार्रवाई नहीं हुई। एफआईआर तब दर्ज हुई, जब एसएसपी रजनेश सिंह को हस्तक्षेप करना पड़ा। ऐसे में सवाल सिरगिट्टी थाना प्रभारी पर उठ रहे हैं कि जब गंभीर मामलों में भी पीड़ितों को एसएसपी तक पहुंचना पड़े, तो फिर थाने की जवाबदेही आखिर है किसकी?
Bilaspur बिलासपुर। एक सवाल है। अगर आपकी बेटी, बहन या परिवार की कोई महिला अपराध का शिकार होकर थाने पहुंचे, तो क्या उसे तुरंत न्याय मिलेगा? या फिर उसे आवेदन, बहाने, क्षेत्राधिकार और अधिकारियों के चक्कर में उलझा दिया जाएगा?
बिलासपुर। क्या सिरगिट्टी थाना पीड़ितों की शिकायत दर्ज करने के बजाय उन्हें थकाने और टालने की जगह बनता जा रहा है? बीते कुछ दिनों में सामने आए दो मामलों ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक मामले में नाबालिग छात्रा से दुष्कर्म की शिकायत लेकर पहुंचा परिवार एफआईआर के लिए भटकता रहा, वहीं दूसरे मामले में मारपीट की शिकार युवती को भी आवेदन लेकर वापस भेजने की कोशिश की गई। दोनों मामलों में कार्रवाई तब हुई, जब पीड़ित पक्ष ने वरिष्ठ अधिकारियों का दरवाजा खटखटाया।
ताजा मामला रायपुर की एक 20 वर्षीय युवती से जुड़ा है, जो अपने इंस्टाग्राम मित्र और कथित प्रेमी से मिलने तिफरा पहुंची थी। आरोप है कि युवक के बड़े भाई ने उसके साथ मारपीट की। घायल युवती जब शिकायत लेकर सिरगिट्टी थाने पहुंची तो तत्काल अपराध दर्ज करने के बजाय आवेदन लेकर मामला टालने की कोशिश की गई। युवती के वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क करने के बाद ही पुलिस ने एफआईआर दर्ज की।
यह घटना अभी चर्चा में ही थी कि एक और गंभीर मामला सामने आ गया। सिरगिट्टी क्षेत्र की 15 वर्षीय छात्रा ने आरोप लगाया कि स्कूल के शिक्षक ने पुस्तक दिलाने के बहाने उसे होटल ले जाकर दुष्कर्म किया। छात्रा ने पहले स्कूल प्रबंधन को बताया, लेकिन उसकी बात अनसुनी कर दी गई। बाद में जब परिवार शिकायत लेकर सिरगिट्टी थाने पहुंचा तो आरोप है कि पुलिस ने पहले घटनास्थल का बहाना बनाया, फिर पेट्रोलिंग वाहन के साथ दिनभर घुमाया, लेकिन मामला दर्ज नहीं किया। अंततः एसएसपी के हस्तक्षेप के बाद अपराध दर्ज हुआ।
सवाल सिर्फ अपराध का नहीं, पुलिस के रवैये का भी
कानून कहता है कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस को तत्काल एफआईआर दर्ज करनी चाहिए। फिर ऐसा क्यों दिखाई दे रहा है कि पीड़ितों को पहले थाने में संघर्ष करना पड़ रहा है और बाद में वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचना पड़ रहा है?
जब एक नाबालिग छात्रा दुष्कर्म की शिकायत लेकर पहुंचती है, तब भी देरी क्यों होती है? जब मारपीट की शिकार युवती मदद मांगती है, तब भी आवेदन लेकर टालने की कोशिश क्यों होती है? क्या थाने में अपराध दर्ज करने से बचने की प्रवृत्ति विकसित हो रही है? या फिर अपराध के आंकड़े कम दिखाने की कवायद में पीड़ितों को न्याय के लिए भटकाया जा रहा है?
बढ़ते अपराध, बढ़ती शिकायतें
बीते एक महीने के दौरान सिरगिट्टी और आसपास के क्षेत्रों से दुष्कर्म, मारपीट, महिलाओं के साथ हिंसा और कानून–व्यवस्था से जुड़े कई मामले सामने आए हैं। इससे साफ है कि अपराध का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है। लेकिन चिंता की बात यह है कि अपराध से ज्यादा चर्चा पुलिस की प्रारंभिक निष्क्रियता की हो रही है।
यदि हर गंभीर शिकायत में पीड़ितों को पहले अधिकारियों से गुहार लगानी पड़े, तो फिर आम नागरिक सीधे थाने पर कितना भरोसा करेगा? यह सवाल केवल सिरगिट्टी थाना ही नहीं, पूरे पुलिस तंत्र की छवि से जुड़ा हुआ है।
जवाब का इंतजार
दो अलग–अलग घटनाएं, दो अलग–अलग पीड़ित, लेकिन आरोप लगभग एक जैसे—“पहले टालमटोल, फिर अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद कार्रवाई।” ऐसे में यह जानना जरूरी है कि क्या इन मामलों की विभागीय समीक्षा होगी? क्या यह जांच होगी कि प्रारंभिक स्तर पर कार्रवाई में देरी क्यों हुई? और सबसे बड़ा सवाल—क्या पीड़ितों को न्याय पाने के लिए हर बार एसएसपी तक पहुंचना पड़ेगा?
कानून की किताब में पुलिस को पीड़ित का पहला सहारा माना गया है। लेकिन यदि वही सहारा सबसे पहले संदेह के घेरे में आ जाए, तो चिंता सिर्फ एक थाने की नहीं, पूरे सिस्टम की होनी चाहिए।
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