CG News:- रेत उत्खनन में वर्चस्व जमाने जारी है खूनी खेल, साल भर में इस जिले में जा चुकी है रेत उत्खनन के विवाद पर चार जानें, क्या कोरिया जैसी घटना के इंतजार में है शासन–प्रशासन?

CG News:- जिले में रेत उत्खनन अब कमाई का साधन नहीं बल्कि वर्चस्व की हिंसक जंग बन चुका है। अवैध खनन और माफियाई नेटवर्क के बढ़ते दबदबे ने पूरे इलाके की कानून-व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। हालात यह हैं कि पिछले एक वर्ष में रेत उत्खनन से जुड़े विवादों में चार लोगों की जान जा चुकी है, जबकि लगातार बढ़ती घटनाएं शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।

Janjgir Champa जांजगीर–चांपा। जिले में रेत खनन अब महज कारोबार नहीं रह गया है, बल्कि यह वर्चस्व, वसूली और खूनी संघर्ष का मैदान बन चुका है। प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध इस क्षेत्र में अवैध रेत उत्खनन और संगठित माफियाई नेटवर्क ने कानून–व्यवस्था को खुली चुनौती दे दी है। स्थिति यह है कि पिछले एक वर्ष में रेत से जुड़े विवादों में चार लोगों की जान जा चुकी है, जिससे पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
करही रेत घाट: क्यों बन गया लगातार हिंसा का केंद्र?
पूरा विवाद करही रेत घाट से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है, जहां वर्चस्व की लड़ाई लगातार जानलेवा घटनाओं में बदलती रही है। पहले इसी घाट पर वसूली की रकम के बंटवारे को लेकर तत्कालीन उपसरपंच की हत्या कर दी गई थी। इसके बाद बदले की आग में दो लोगों को जहर देकर मार दिया गया।
अब ताजा मामला 14 अप्रैल 2026 का है, जब हथियारबंद माफियाओं ने एक रेत कारोबारी के घर में घुसकर पिस्टल तान दी और दनादन फायरिंग कर दी। इस घटना में एक युवक की मौत हो गई, जबकि दूसरा गंभीर रूप से घायल है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर एक ही रेत घाट बार–बार खूनी संघर्ष का केंद्र क्यों बनता जा रहा है?
महानदी–हसदेव किनारे फैला अवैध रेत नेटवर्क
जिले में रेत उत्खनन का बड़ा नेटवर्क महानदी और हसदेव नदी के किनारों तक फैला हुआ है। प्रशासनिक आंकड़ों के मुताबिक जहां 19 वैध रेत घाट संचालित हैं, वहीं इसके मुकाबले चार गुना से अधिक अवैध घाटों से माफिया खुलेआम रेत का उत्खनन कर रहे हैं।
चौंकाने वाली बात यह है कि इन अवैध घाटों पर चेन माउंटेन मशीन और जेसीबी का बेखौफ इस्तेमाल हो रहा है, जो पूरे सिस्टम की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
टास्क फोर्स की कार्रवाई पर उठे सवाल
अवैध रेत खनन पर नियंत्रण के लिए पुलिस और प्रशासन की संयुक्त टास्क फोर्स गठित की गई है, लेकिन जमीनी हकीकत अलग तस्वीर दिखाती है। कार्रवाई के बाद मशीनें हटाई जाती हैं, लेकिन कुछ ही दिनों में माफिया फिर सक्रिय हो जाते हैं और रेत घाटों पर उत्खनन शुरू कर देते हैं।ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या यह कार्रवाई प्रभावी नहीं है या फिर माफिया तंत्र इतना मजबूत हो चुका है कि प्रशासनिक दबाव भी बेअसर साबित हो रहा है?
अधिकारियों पर दबाव और धमकी की भी चर्चा
कई मामलों में यह भी सामने आया है कि रेत घाटों की जांच और कार्रवाई के दौरान अधिकारियों को विरोध, दबाव और धमकी का सामना करना पड़ा है। इससे यह साफ होता है कि यह नेटवर्क अब केवल अवैध खनन तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि एक संगठित अपराध तंत्र के रूप में विकसित हो चुका है।
बिर्रा थाना क्षेत्र में दहशत और अनसुलझे सवाल
लगातार हो रही हत्याओं और फायरिंग की घटनाओं ने बिर्रा थाना क्षेत्र को दहशत में डाल दिया है।
कोरिया जैसी घटना के इंतजार में प्रशासन?
लगातार बढ़ते खूनी संघर्ष और चार मौतों के बावजूद अब तक स्थायी नियंत्रण नहीं हो पाने से सवाल उठने लगे हैं कि क्या शासन–प्रशासन किसी बड़ी घटना का इंतजार कर रहा है, जैसा पहले अन्य जिलों में देखने को मिला था।
स्थानीय लोगों और जानकारों का सवाल है कि आखिर कब तक रेत के इस ‘सफेद कारोबार’ में खून बहता रहेगा? क्या प्रशासन इस माफियाई नेटवर्क पर स्थायी नियंत्रण पाने में सफल होगा, या फिर यह संघर्ष इसी तरह लोगों की जान लेता रहेगा?
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