CG News:- नाम पूछा… धर्म पूछा… फिर गोलियां चला दीं, कुलगाम में आतंकियों ने उजाड़ दिए छत्तीसगढ़ के दो घर; अब अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाए परिवार

CG News:- जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में हुए आतंकी हमले ने छत्तीसगढ़ के दो परिवारों को गहरा जख्म दे दिया। सक्ती के दीपक रात्रे और सारंगढ़-बिलाईगढ़ के भूपेंद्र भैना की मौत के बाद परिजनों का आरोप है कि वे अपने अपनों के अंतिम दर्शन तक नहीं कर पाए। सरकार ने दोनों परिवारों के लिए 20-20 लाख रुपये की सहायता की घोषणा की है।
सक्ती के दीपक रात्रे और सारंगढ़-बिलाईगढ़ के भूपेंद्र भैना की मौत, परिजनों का आरोप- शव नहीं सौंपे गए; सरकार ने 20-20 लाख सहायता का किया ऐलान
छत्तीसगढ़। रोटी कमाने के लिए घर से हजारों किलोमीटर दूर गए दो मजदूरों ने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि वे लौटकर अपने गांव नहीं आ पाएंगे। जम्मू-कश्मीर के कुलगाम जिले में हुए आतंकी हमले ने छत्तीसगढ़ के दो परिवारों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। सक्ती जिले के दीपक रात्रे और सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के भूपेंद्र कुमार भैना अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनके घरों में चूल्हा तो जल रहा है, लेकिन उम्मीदें बुझ चुकी हैं।
जानकारी के अनुसार, शुक्रवार देर शाम कुलगाम जिले के केलम क्षेत्र स्थित एक ईंट भट्ठे में काम कर रहे मजदूरों पर आतंकियों ने हमला कर दिया। प्रत्यक्ष जानकारी के मुताबिक हमलावरों ने पहले मजदूरों से उनका नाम और धर्म पूछा। परिजनों का कहना है कि हिंदू होने की जानकारी मिलने के बाद आतंकियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी।
इस हमले में सक्ती जिले के मालखरौदा थाना क्षेत्र के ग्राम बुंदेली निवासी दीपक रात्रे (पिता- उमाशंकर रात्रे) की मौके पर ही मौत हो गई। वहीं सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के भूपेंद्र कुमार भैना गंभीर रूप से घायल हुए और अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने भी दम तोड़ दिया।
दीपक रात्रे की कहानी किसी आम मजदूर की कहानी जैसी ही थी। बचपन से वह अपने मामा के गांव हरदीडीह (जैजैपुर) में रहकर पढ़ा-लिखा। शादी भी वहीं से हुई। करीब एक साल पहले पत्नी और भाई के साथ परिवार की बेहतर जिंदगी की उम्मीद लेकर जम्मू-कश्मीर गया था। ईंट भट्ठे में मजदूरी कर वह अपने परिवार का सहारा बना हुआ था।
देर रात जब सक्ती प्रशासन को घटना की जानकारी मिली तो पुलिस अधीक्षक के निर्देश पर पुलिस टीम मृतक के घर पहुंची। जैसे ही परिवार को दीपक की मौत की खबर मिली, घर में चीख-पुकार मच गई। पूरे गांव में मातम छा गया। हरदीडीह में भी मामा का परिवार सदमे में है।
शुरुआत में प्रशासन पार्थिव शरीर को छत्तीसगढ़ लाने के लिए समन्वय की बात कर रहा था, लेकिन बाद में विवाद खड़ा हो गया।
दीपक रात्रे के मामा दिलहरण सांडे का आरोप है कि उनके भांजे का पार्थिव शरीर गांव लाया ही नहीं गया। उनका कहना है कि दीपक बचपन से उनके घर में रहा, उसकी पढ़ाई से लेकर शादी तक की जिम्मेदारी उन्होंने निभाई। ऐसे में अंतिम संस्कार का अधिकार भी परिवार को मिलना चाहिए था।
दीपक के नाना शंकरलाल सांडे और मामा परिवार का कहना है कि वे अपने भांजे का अंतिम संस्कार करना चाहते थे, लेकिन उन्हें यह अवसर नहीं मिला। परिवार ने मीडिया के सामने आरोप लगाया कि दीपक रात्रे और भूपेंद्र कुमार भैना के पार्थिव शरीर उन्हें नहीं सौंपे गए और जम्मू-कश्मीर में ही अंतिम संस्कार कर दिया गया। उनका दावा है कि वे अपने बेटे का अंतिम दर्शन तक नहीं कर सके।
इधर, छत्तीसगढ़ सरकार ने दोनों मृतक मजदूरों के परिजनों को 20-20 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक सवाल लगातार गूंज रहा है। क्या मुआवजा उस पीड़ा की भरपाई कर सकता है, जब एक परिवार अपने बेटे का अंतिम चेहरा तक न देख पाए? परिजनों के आरोपों की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन उनका दर्द साफ दिखाई देता है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि संबंधित एजेंसियां इन आरोपों पर क्या स्पष्टीकरण देती हैं और आखिर किन परिस्थितियों में दोनों मजदूरों के पार्थिव शरीर उनके गृह राज्य नहीं पहुंच सके।

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