CG News:- 22 महीने में पीएचडी, नियमों पर पर्दा?”— कुलसचिव की डिग्री पर उठा बड़ा सवाल, राजभवन पहुंचा मामला “डिग्री या सेटिंग?” — विश्वविद्यालय के कुलसचिव पर गंभीर आरोप, एसएफआई ने मांगी जांच

हेमचंद यादव विश्वविद्यालय दुर्ग के कुलसचिव भूपेंद्र कुलदीप पर अकादमिक कदाचार का आरोप, राजभवन में सौंपा गया ज्ञापन
रायपुर। स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ India (एसएफआई) ने हेमचंद यादव विश्वविद्यालय दुर्ग के कुलसचिव भूपेंद्र कुलदीप की पीएचडी डिग्री की जांच कराने और डिग्री निरस्त करने की मांग को लेकर राज्यपाल के नाम राजभवन में ज्ञापन सौंपा है। संगठन ने आरोप लगाया है कि कुलसचिव ने अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए यूजीसी के नियमों का उल्लंघन कर संदिग्ध तरीके से पीएचडी उपाधि हासिल की।
एसएफआई के जिलाध्यक्ष गर्व गभने, जिलासचिव हर्ष संघाणी और राज्य सचिव दुष्यंत साहू ने कहा कि यह मामला केवल एक व्यक्ति की डिग्री का नहीं, बल्कि पूरे उच्च शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ है। संगठन का आरोप है कि अकादमिक प्रक्रिया के साथ गंभीर स्तर पर छेड़छाड़ की गई और नियमों को दरकिनार कर डिग्री प्राप्त की गई।
एम.फिल. डिग्री को लेकर उठे गंभीर सवाल
ज्ञापन में कहा गया है कि भूपेंद्र कुलदीप ने सीवी रमन विश्वविद्यालय से माइक्रोबायोलॉजी विषय में एम.फिल. उपाधि प्राप्त की। एसएफआई का आरोप है कि यह डिग्री केवल पीएचडी के अनिवार्य कोर्सवर्क से बचने के उद्देश्य से हासिल की गई।
संगठन ने दावा किया कि एम.फिल. के प्रथम और द्वितीय सेमेस्टर की अंकसूचियां एक ही तारीख में जारी हुईं, जो सामान्य शैक्षणिक प्रक्रिया के अनुसार संभव नहीं माना जा सकता। इसे प्रक्रियागत हेरफेर का संकेत बताते हुए एसएफआई ने इसकी जांच की मांग की है।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि भूपेंद्र कुलदीप वर्ष 2001 से 2014 तक राजनांदगांव स्थित छत्तीसगढ़ डेंटल कॉलेज में व्याख्याता के रूप में कार्यरत थे और रायपुर में निवास करते थे। ऐसे में लगभग 200 किलोमीटर दूर बिलासपुर के कोटा स्थित विश्वविद्यालय से माइक्रोबायोलॉजी जैसे प्रायोगिक विषय में नियमित एम.फिल. करना कैसे संभव हुआ, इस पर भी सवाल उठाए गए हैं।
शोध पर्यवेक्षक की पात्रता पर भी विवाद
एसएफआई ने भूपेंद्र कुलदीप की शोध पर्यवेक्षक डॉ. लुमेश्वरी साहू की पात्रता को भी नियमों के विपरीत बताया है। संगठन का कहना है कि डॉ. साहू वर्ष 2023 में पीएचडी पूर्ण करने के बाद कांकेर जिले के अंतागढ़ स्थित शासकीय लाल कालिंद सिंह महाविद्यालय में अतिथि व्याख्याता के रूप में नियुक्त हुईं।
ज्ञापन में कहा गया है कि यूजीसी विनियम 6(1) के अनुसार पीएचडी शोध निर्देशन के लिए स्थायी संस्थागत सदस्य होना आवश्यक है, जबकि अतिथि व्याख्याता इस श्रेणी में नहीं आते। इसके अलावा एसएफआई ने यह भी आरोप लगाया कि डॉ. साहू के पास सहायक प्राध्यापक स्तर के लिए आवश्यक न्यूनतम तीन पीयर–रिव्यूड शोध प्रकाशन भी उपलब्ध नहीं हैं।
संगठन ने दावा किया कि उनके नाम से उपलब्ध एकमात्र शोधपत्र भूपेंद्र कुलदीप के साथ सह-लेखक के रूप में एक कथित “प्रिडेटरी जर्नल” JARSCT में प्रकाशित हुआ है, जिसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए हैं।
“22 महीने में पूरी हुई पीएचडी”, यूजीसी नियमों के उल्लंघन का आरोप
एसएफआई ने आरोप लगाया कि भूपेंद्र कुलदीप की पीएचडी केवल 22 महीनों में पूरी कर दी गई, जबकि यूजीसी विनियमों के अनुसार पीएचडी की न्यूनतम अवधि 36 महीने निर्धारित है।
ज्ञापन के अनुसार, अधिसूचना BV/RDC/116 के तहत पंजीकरण से लेकर आरडीसी और वाइवा तक की प्रक्रिया मात्र 22 महीने में पूरी हुई, जो निर्धारित अवधि से लगभग 14 महीने कम है। संगठन का कहना है कि इतने कम समय में अनिवार्य कोर्सवर्क, शोध कार्य और थीसिस तैयार करना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है।
एसएफआई ने इसे यूजीसी पीएचडी विनियम 2016 और 2022 के स्पष्ट उल्लंघन का मामला बताया है।
भारती विश्वविद्यालय की मान्यता प्रक्रिया पर भी सवाल
संगठन ने भारती विश्वविद्यालय की पीएचडी मान्यता प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े किए हैं। ज्ञापन में कहा गया कि विश्वविद्यालय की स्थापना वर्ष 2021 में हुई और स्थापना के एक वर्ष के भीतर ही उसे पीएचडी कार्यक्रम संचालित करने की अनुमति मिल गई।
एसएफआई ने सवाल उठाया कि बिना पर्याप्त शोध अवसंरचना, अकादमिक परिपक्वता और योग्य संकाय के किसी विश्वविद्यालय को इतनी जल्दी पीएचडी कार्यक्रम संचालित करने की अनुमति कैसे दी गई।
ज्ञापन में यह भी दावा किया गया कि भूपेंद्र कुलदीप ने पीएचडी करने की अनुमति के लिए वर्ष 2019 में आवेदन किया था, जबकि उस समय भारती विश्वविद्यालय अस्तित्व में ही नहीं था। इसे लेकर उच्च शिक्षा विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं।
राज्यपाल से निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग
एसएफआई नेताओं ने राज्यपाल से पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। संगठन ने कहा कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित पीएचडी डिग्री निरस्त की जाए और नियमों के उल्लंघन में शामिल अधिकारियों तथा संस्थानों के खिलाफ भी कार्रवाई हो।
संगठन ने चेतावनी दी कि यदि मामले में शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो प्रदेशभर में छात्र आंदोलन शुरू किया जाएगा।
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