
CG News:- सावन शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को श्रावण पुत्रदा एकादशी के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत 23 अगस्त 2026, रविवार को रखा जाएगा। हिंदू धार्मिक मान्यताओं में इस एकादशी का विशेष महत्व है। मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत रखने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और निःसंतान दंपतियों को संतान सुख का आशीर्वाद मिलता है।
रतनपुर। श्रावण मास की पुत्रदा एकादशी को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष धार्मिक उत्साह है। श्री सिद्ध तंत्र पीठ भैरव मंदिर रतनपुर के पं. जागेश्वर अवस्थी के अनुसार हिंदू धर्म में एकादशी को महत्वपूर्ण तिथि माना गया है। श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस व्रत के प्रभाव से भक्तों को संतान प्राप्ति का वरदान मिलने के साथ जीवन में किए गए पापों से मुक्ति और मरणोपरांत मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस व्रत से वाजपेयी यज्ञ के समान पुण्यफल मिलने की भी मान्यता है।
सूर्योदय से पहले स्नान, भगवान विष्णु की पूजा
श्रावण पुत्रदा एकादशी के दिन व्रती को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाने के साथ पूजा में तुलसी, ऋतु फल और तिल का प्रयोग किया जाता है।
व्रत रखने वाले श्रद्धालु निराहार रह सकते हैं। शाम को भगवान विष्णु की पूजा के बाद इच्छानुसार फल ग्रहण किया जा सकता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार विष्णुसहस्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
एकादशी की रात जागरण का भी विशेष महत्व बताया गया है। श्रद्धालु रात में भजन–कीर्तन और भगवान विष्णु का स्मरण करते हैं। अगले दिन द्वादशी तिथि को ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद दान–दक्षिणा देने और इसके बाद स्वयं भोजन कर व्रत का पारण करने की परंपरा है।
क्या है श्रावण पुत्रदा एकादशी की पौराणिक कथा?
पद्म पुराण में श्रावण पुत्रदा एकादशी से जुड़ी कथा का उल्लेख मिलता है। द्वापर युग में महिष्मतीपुरी के राजा महीजित बेहद शांत और धर्मप्रिय थे, लेकिन वे पुत्रहीन थे। राजा के शुभचिंतकों ने उनकी चिंता महामुनि लोमेश के सामने रखी।
महामुनि ने बताया कि राजा पूर्व जन्म में एक अत्याचारी और धनहीन वैश्य थे। एकादशी के दिन दोपहर में प्यास से व्याकुल होकर वे एक जलाशय के पास पहुंचे। वहां गर्मी से परेशान एक प्यासी गाय पानी पी रही थी। धार्मिक कथा के अनुसार वैश्य ने गाय को पानी पीने से रोक दिया और स्वयं जल पीने लगे। इस कर्म को धर्म के विरुद्ध माना गया।
मुनि ने बताया कि पूर्व जन्म के पुण्य कर्मों के कारण उन्हें अगले जन्म में राजा का पद तो प्राप्त हुआ, लेकिन उस एक पाप के कारण वे संतान सुख से वंचित रहे।
प्रजा के व्रत से राजा को मिला संतान सुख
महामुनि लोमेश ने राजा के शुभचिंतकों को सलाह दी कि श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी का विधिपूर्वक व्रत कर उसका पुण्य राजा को समर्पित करें। मुनि के निर्देश के अनुसार राजा के साथ प्रजा ने भी श्रद्धापूर्वक एकादशी का व्रत रखा और उसका पुण्य राजा को समर्पित किया।
धार्मिक कथा के अनुसार इसके कुछ समय बाद राजा की रानी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। इसी मान्यता के चलते इस एकादशी को ‘पुत्रदा एकादशी’ कहा गया।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत विशेष रूप से संतान सुख की कामना रखने वाले दंपतियों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके साथ ही भगवान विष्णु की आराधना, भजन–कीर्तन और दान–पुण्य से आध्यात्मिक लाभ मिलने की मान्यता है।

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