ACB Raid: केस कमजोर करने की 20 हजार में ‘सेटलमेंट’? 15 हजार लेते ही घूसखोर प्रधान आरक्षक गिरफ्तार—क्या थाने में ही लिखी जा रही थी रिश्वत की स्क्रिप्ट?

ACB Raid: एफआईआर दर्ज हो चुकी थी। फाइल थाने में थी। लेकिन उसी फाइल के भीतर एक “और कीमत” भी तय हो रही थी—20 हजार की मांग से शुरू हुई बात 15 हजार पर आकर ठहर गई। और फिर वही 15 हजार एंटी करप्शन ब्यूरो के ट्रैप में सबूत बन गए।
बेमेतरा। छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के थाना थान–खम्हरिया से एक ऐसा मामला सामने आया है, जो फिर से यह सवाल छोड़ देता है कि क्या एफआईआर के बाद कहानी सिर्फ कानून से चलती है या कुछ और भी बीच में जगह बना लेता है।
यहां पदस्थ प्रधान आरक्षक अजय लहरे पर आरोप है कि वह दर्ज अपराध में केस को कमजोर करने के नाम पर परिजनों से रिश्वत की मांग कर रहा था।
“बात 20 हजार से शुरू हुई थी…”
शिकायतकर्ता अनीश पटेल ने एंटी करप्शन ब्यूरो को बताया कि पहले 20 हजार रुपये की मांग की गई थी। यह मांग किसी लिखित नोटिस में नहीं थी, न ही किसी रिकॉर्ड में—लेकिन बातचीत में थी, और वही सबसे अहम बन गई।
फिर बातचीत आगे बढ़ी। मोलभाव हुआ। और रिश्वत की रकम घटकर 15 हजार पर आ गई। सिस्टम के भीतर सौदेबाजी का यह वह हिस्सा था, जो अक्सर सामने नहीं आता—लेकिन इस बार रिकॉर्ड में आ गया।
शिकायत, सत्यापन और फिर तैयारी
शिकायत एसीबी तक पहुंची। सत्यापन हुआ। आरोप सही पाए गए। इसके बाद ट्रैप की तैयारी शुरू हुई।शिकायतकर्ता का कहना था कि वह रिश्वत नहीं देना चाहता, बल्कि इस पूरे खेल को सामने लाना चाहता है। और इसी के साथ कहानी का अगला अध्याय लिखा गया।
26 जून 2026: जब रकम ने सच उजागर कर दिया
शुक्रवार को एसीबी ने ट्रैप लगाया। तय योजना के मुताबिक जैसे ही 15 हजार रुपये दिए गए, प्रधान आरक्षक अजय लहरे ने उन्हें स्वीकार किया। और उसी पल टीम ने मौके पर पकड़ लिया।कुछ सेकंड में पूरा “लेन–देन” कानून के कैमरे में बदल गया।
कानून की धाराएं और आगे की कार्रवाई
एसीबी ने आरोपी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (संशोधित 2018) की धारा 7 के तहत कार्रवाई शुरू कर दी है।
और अंत में सवाल…
यह सिर्फ एक गिरफ्तारी नहीं है। यह उस व्यवस्था की एक झलक है, जहां एफआईआर के बाद भी केस की दिशा कभी–कभी फाइल से नहीं, “फीस” से तय होने लगती है।
और सवाल फिर वही है—थाने में भरोसा किस पर रखा जाए, कानून पर या बातचीत पर?
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