बस्तर की तपिश में सूखे नल, जल जीवन मिशन के वादों से आगे संघर्ष की कहानी,1–2 किमी दूर से पानी ढोने को मजबूर

// छत्तीसगढ़ के अग्रणी अंग्रेजी दैनिक ‘द हितवाद (The Hitavada)’ के इंस्टाग्राम रील ने जमगुड़ा गांव की हकीकत उजागर की, टंकी बनी पर पानी नहीं
// 42–43 डिग्री तापमान में ग्रामीण रोजाना 1–2 किमी दूर से पानी ढोने को मजबूर
// भूजल गिरने का हवाला, ग्रामीणों ने जवाबदेही और क्रियान्वयन पर उठाए सवाल
कान्हा तिवारी
बिलासपुर/बस्तर , 2 मई।
बस्तर जिले के पिपलवांड पंचायत अंतर्गत जमगुड़ा गांव की तस्वीर एक बार फिर सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े कर रही है। छत्तीसगढ़ के अग्रणी अंग्रेजी दैनिक ‘द हितवाद (The Hitavada)’ के इंस्टाग्राम रील के जरिए सामने आई यह रिपोर्ट दिखाती है कि जहां कागजों पर “हर घर जल” का सपना साकार बताया जा रहा है, वहीं जमीन पर लोग बूंद–बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
गांव में ओवरहेड टंकी खड़ी है, घर–घर नल कनेक्शन भी दिखाई देते हैं और दीवारों पर जल जीवन मिशन के नारे भी लिखे हैं, लेकिन इन सबके बावजूद नलों में पानी नहीं है। यह दृश्य योजनाओं की मंशा और उनके क्रियान्वयन के बीच की खाई को साफ तौर पर उजागर करता है।
भीषण गर्मी के इस दौर में, जब तापमान 42 से 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है, जमगुड़ा के ग्रामीणों की दिनचर्या पानी के इंतजाम के इर्द–गिर्द सिमट गई है। महिलाएं और बच्चे रोजाना एक से दो किलोमीटर तक पैदल चलकर पानी लाने को मजबूर हैं। सिर पर बर्तन और तपती धूप के बीच यह संघर्ष उनके जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है।
ग्रामीणों का कहना है कि योजना के तहत ढांचा तो खड़ा कर दिया गया, लेकिन जल आपूर्ति कभी नियमित नहीं हो पाई। वादे गांव तक पहुंचे, पर सुविधा नहीं पहुंच सकी। छत्तीसगढ़ के अग्रणी अंग्रेजी दैनिक ‘द हितवाद (The Hitavada)’ की रील में कैद हर फ्रेम इस विरोधाभास को उजागर करता है।
वहीं, अधिकारियों का तर्क है कि क्षेत्र शुष्क है और भूजल स्तर में लगातार गिरावट के कारण टंकी में पानी भर पाना संभव नहीं हो पा रहा है। हालांकि कारण स्पष्ट होने के बावजूद स्थायी समाधान का अभाव ग्रामीणों के मन में जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े कर रहा है।
यह स्थिति केवल एक गांव की नहीं, बल्कि उन कई ग्रामीण इलाकों की कहानी है जहां आधारभूत ढांचा तो तैयार कर दिया गया, लेकिन जल स्रोतों के दीर्घकालिक प्रबंधन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
संघर्ष के बावजूद जीवन थमा नहीं है। लोग परिस्थितियों के साथ तालमेल बैठा रहे हैं, लेकिन यह सवाल अब भी कायम है कि जब ढांचा मौजूद है, तो सेवा क्यों नहीं। समस्या अब जागरूकता की नहीं, बल्कि प्रभावी क्रियान्वयन की है।

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