
बिलासपुर। हाईकोर्ट ने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 और निजता को लेकर अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की सिंगल बेंच ने कहा कि किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारी जैसे मैरिज रजिस्ट्रेशन आवेदन, जन्मतिथि, पहचान पत्र या निजी दस्तावेज आरटीआई के के तहत किसी तीसरे पक्ष को नहीं दी जा सकती, जब तक कि इसमें कोई बड़ा जनहित जुड़ा हो।
अंबिकापुर निवासी डीके सोनी ने हाईकोर्ट में याचिकाएं लगाई थीं, पहली याचिका में सूरजपुर जिले के अपर कलेक्टर व विशेष विवाह अधिकारी के समक्ष कपिल देव पैकरा और लवकेश कुमार पैकरा द्वारा प्रस्तुत विवाह पंजीयन आवेदनों, संलग्न दस्तावेजों, आदेश और इश्तहार की प्रमाणित प्रतियां आरटीआई के तहत मांगी थीं। जन सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अधिकारी, सूरजपुर ने यह कहते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया था कि मामला विचाराधीन न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है और आवेदक थर्ड पार्टी है, इसलिए नियमों के तहत यह जानकारी नहीं दी जा सकती।
इसके बाद मामला राज्य सूचना आयोग रायपुर पहुंचा। आयोग ने 10 अक्टूबर 2019 को द्वितीय अपील खारिज करते हुए जन सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अधिकारी के फैसले को सही ठहराया था। इसके खिलाफ सोनी ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई।
निजता पर अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं:–
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि आरटीआई अधिनियम का मुख्य उद्देश्य पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन बनाना है, लेकिन धारा 8(1)(जे) के तहत व्यक्तिगत निजता की रक्षा का भी स्पष्ट प्रावधान है। विवाह पंजीयन के लिए दिए गए आवेदन में नाम, पता, फोटो, जन्मतिथि और पहचान पत्र जैसे गोपनीय डेटा होते हैं। यदि याचिकाकर्ता कोई व्यापक जनहित जैसे भ्रष्टाचार उजागर करना या पद का दुरुपयोग साबित नहीं करता, तो ऐसी जानकारी देना व्यक्ति की निजता पर अनावश्यक हमला होगा। इस आधार पर कोर्ट ने दो याचिकाओं को खारिज कर दिया।
सूचना आयोग को फटकार- कहा- प्रशिक्षण की सलाह देना अपील का निपटारा नहीं:–
तीसरी याचिका में सोनी ने डीपीएस. तिवारी के खिलाफ हुई शिकायत, जांच रिपोर्ट और गवाहों के बयानों की प्रतियां मांगी थीं। जनसूचना अधिकारी ने जांच लंबित होने का हवाला देकर मना कर दिया था। इस मामले में राज्य सूचना आयोग ने प्रथम अपीलीय अधिकारी को समय सीमा में काम करने की सलाह दी और सरगुजा यूनिवर्सिटी व संबंधित अधिकारियों को ट्रेनिंग देने के निर्देश देकर अपील बंद कर दी थी। हाई कोर्ट ने इस रवैये पर भारी नाराजगी जताते हुए कहा कि सूचना आयोग राज्य की अंतिम अपीलीय संस्था है। आयोग का दायित्व केवल प्रक्रियात्मक कमियों पर टिप्पणी करना या ट्रेनिंग की बात कहना नहीं है, बल्कि यह तय करना है कि मांगी गई जानकारी कानूनन दी जा सकती है या धारा 8 के तहत छूट प्राप्त है। कोर्ट ने आयोग के आदेश को निरस्त करते हुए मामले को वापस कर दिया है। निर्देश दिया कि 90 दिनों के भीतर दोनों पक्षों को सुनकर आदेश पारित करें।

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